बात साल 1966 की है। बफेट ने महज 4 मिलियन डॉलर में डिज्नी में 5% हिस्सेदारी खरीद ली। अगले साल 1967 में ही अपनी यह हिस्सेदारी 6 मिलियन डॉलर में बेच दी, जिससे उन्हें 50% का मुनाफा हुआ। अब बफेट ने अफसोस जताया कि अगर वह वह 5% हिस्सा आज तक रखे होते, तो उसकी कीमत 8 से 10 अरब डॉलर के बीच होती।
बेचने का फैसला गलत साबित हुआ
हालांकि, बफेट से एक बड़ी चूक हुई। अपनी सामान्य लंबी अवधि की निवेश नीति के विपरीत, उन्होंने अगले साल 1967 में ही अपनी यह हिस्सेदारी 6 मिलियन डॉलर में बेच दी, जिससे उन्हें 50% का मुनाफा हुआ। बाद में इस फैसले पर पछतावा करते हुए बफेट ने इसे एक बड़ी भूल करार दिया।
उन्होंने समझाया कि उस वक्त वह कंपनी के असली मूल्य को नहीं समझ पाए थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फिल्म ‘मैरी पोपिन्स’ ने उस साल लगभग 30 मिलियन डॉलर कमाए थे, और यह फिल्म सालों बाद भी बच्चों की नई पीढ़ी को दिखाई जा सकती थी। उन्होंने इसे एक ऐसे तेल के कुएं से जोड़ा जहां से तेल निकलने के बाद वापस भर जाता है।
डिज्नी के पास 200 से ज्यादा फिल्में और एनाहिम में 300 एकड़ जमीन थी, जहां डिज्नीलैंड हर साल 90 लाख लोग आते थे। इतना सब कुछ होने के बावजूद पूरी कंपनी सिर्फ 80 मिलियन डॉलर में बिक रही थी। बफेट ने अफसोस जताया कि अगर वह वह 5% हिस्सा आज तक रखे होते, तो उसकी कीमत 8 से 10 अरब डॉलर के बीच होती।
सीख: गलतियों से घबराएं नहीं, आगे बढ़ें
बफेट ने 1988 में बर्कशायर हैथवे की वार्षिक बैठक में इस गलती पर बात करते हुए कहा कि हालांकि यह फैसला गलत था, लेकिन यह उनके लिए किसी परेशानी का कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें उस समय खरीदारी जारी रखनी चाहिए थी, लेकिन वह बेचने की जल्दी में थे। उनका मानना है कि अच्छे व्यवसाय समय के साथ और महंगे होते जाते हैं। बफेट की इस कहानी से सीख ली जा सकती है कि पछतावे को छोड़ना सीखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी बेचा, वह आगे चलकर और महंगा हुआ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह उसी बात पर अटके रहें। उन्होंने आगे बढ़कर कोका-कोला जैसी कंपनियों में पैसा लगाया और आज बर्कशायर के पास अप्रत्यक्ष रूप से डिज्नी में हिस्सेदारी भी है। 1996 में जब डिज्नी ने कैपिटल सिटीज/एबीसी का अधिग्रहण किया, तो बर्कशायर को उस डील के चलते डिज्नी में 3.6% हिस्सा मिल गया। इस तरह बफेट का निवेश एक बार फिर डिज्नी से जुड़ गया।
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