- विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचार और बहस के केंद्र बनने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जवल भुइयां ने रविवार (30 अगस्त, 2026) को शिक्षण संस्थानों में छात्रों की तरफ से अपने अलग-अलग विचारों को रखने और सवालों पूछने की आजादी को लेकर बड़ी टिप्पणी की है. इसके साथ ही, उन्होंने छात्रों की तरफ से सवाल पूछे जाने पर किसी भी तरह की सजा की धमकी देने के रवैये को असंवैधानिक और सत्ता का गलत इस्तेमाल करार दिया है. अदालत ने कहा कि किसी भी छात्र को अपनी अलग राय रखने या सवाल पूछने पर सजा देने की धमकी नहीं दी जा सकती है.
उन्होंने विश्वविद्यालयों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘विश्वविद्यालयों को ऐसी जगह होना चाहिए, जहां पूरी आजादी के साथ सोचने की आदत को विकसित किया जाए और छात्र किसी भी मुश्किल सवाल को पूछने में हिचकिचाएं नहीं. जहां स्थापित विचारों की जांच की जा सके, उन पर सवाल उठाए जा सके, जबकि अगर उस विचार पर किसी की असहमति हो, तो उसे दुश्मनी की नजर से न देखा जा सके.’
दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए बोले जस्टिस भुइयां
न्यूज एजेंसी पीटीआई भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर (Masters) छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा, ‘सवाल पूछने का अधिकार किसी भी तरह से विरोध और अवज्ञा का काम नहीं है और असहिष्णु मानसिकता भारत के संविधान की भावना के पूरी तरह से विपरीत है. जब छात्र अपने अलग-अलग विचारों को एक मंच पर रखते हैं या फिर किसी विषय को लेकर सवाल पूछते हैं, तो उन्हें सजा देने की धमकी नहीं दी जा सकती है. यह पूरी तरह से असंवैधानिक है. यह सत्ता और पद का गलत इस्तेमाल है.
उन्होंने कहा, ‘यूनिवर्सिटी एक ऐसी जगह है, जहां लोगों का सामना ऐसे विचारों से होता है, जो शायद उनके अपने विचारों से अलग हों, जहां स्थापित मान्यताओं की जांच की जाती है और उन पर सवाल उठाए जा सकते हैं और जहां असहमति का जवाब दुश्मनी के बजाय तर्क से दिया जा सकता है. अगर हम एक ऐसा लोकतांत्रिक समाज चाहते हैं, जो आजादी और अलग-अलग विचारों का सम्मान करे, तो इस संस्कृति की शुरुआत विश्वविद्यालय से ही होनी चाहिए.’
हमारा संविधान बोलने, सोचने और अलग सोच रखने की देता है आजादी
जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘हमारा संविधान बोलने, सोचने और अलग तरह से विश्वास करने की आजादी की रक्षा करता है. असहिष्णुता उस ढांचे को तब कमजोर करने लगती है, जब असहमति या विरोध को राय का जायज फर्क नहीं, बल्कि ऐसी चीज माना जाने लगता है, जिसे दबाना, खारिज करना या जिसके लिए सजा देना जरूरी हो. इसलिए असहमति के साथ रहने की क्षमता सिर्फ एक सामाजिक गुण नहीं है. यह एक उदार संवैधानिक लोकतंत्र का मूल आधार है.’
उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र तब सार्थक नहीं होता, जब हर कोई एक ही तरह की सोच रखता हो, बल्कि तब होता है, जब अलग-अलग विचार साथ-साथ रह सकें, सुने जा सकें और उनके साथ सम्मान से पेश आया जाए.’
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