चुनाव आयोग ने 15 फरवरी को रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 की धारा 13CC के तहत इन सात अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया था. आरोप थे कि उन्होंने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में गंभीर कदाचार, कर्तव्य की उपेक्षा और वैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग किया. आयोग ने राज्य सरकार को इनके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू करने का निर्देश दिया था.
निलंबन के अलावा विभागीय जांच का आदेश भी था.
सूत्रों ने बताया कि निलंबन के अलावा विभागीय जांच का आदेश भी था. लेकिन मुख्यमंत्री के बयान से लगता है कि राज्य सरकार ने उन्हें सिर्फ चुनावी कार्य से हटाकर अन्य प्रशासनिक पदों पर स्थानांतरित कर दिया है. इससे विभागीय जांच प्रभावी ढंग से कैसे होगी? आयोग को लगता है कि निलंबन का सही क्रियान्वयन नहीं हुआ है.
उन्होंने कहा कि आयोग स्थिति पर नजर रख रहा है और कुछ दिनों में राज्य सरकार से विभागीय जांच की रिपोर्ट मांगेगा. निलंबित सातों अधिकारी हैं- सेफौर रहमान (समसेरगंज विधानसभा, मुर्शिदाबाद जिला), नीतीश दास (फरक्का विधानसभा, मुर्शिदाबाद), दलिया रे चौधरी (मयनागुड़ी विधानसभा, जलपाईगुड़ी), मुर्शिद आलम (सुती विधानसभा, मुर्शिदाबाद), सत्यजीत दास और जॉयदीप कुंडू (कैनिंग पूर्व विधानसभा, दक्षिण 24 परगना) और देबाशीष बिस्वास (देबरा विधानसभा, पश्चिम मेदिनीपुर).
ये सभी राज्य सरकार के अधिकारी हैं, जिन्हें SIR के दौरान असिस्टेंस इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) के रूप में तैनात किया गया था. SIR का उद्देश्य मतदाता सूची में अयोग्य नामों को हटाना और योग्य मतदाताओं को शामिल करना है, खासकर 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विभागीय जांच अपरिहार्य होगी, खासकर जब विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो जाएगी और मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) लागू हो जाएगा. चुनाव आयोग ने संकेत दिए हैं कि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई 2026 में हो सकते हैं और चुनाव कार्यक्रम मार्च के मध्य में घोषित किया जा सकता है.
आचार संहिता लागू होने पर राज्य सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण ECI के अधीन आ जाएगा, जिससे इन अधिकारियों के खिलाफ जांच में देरी या टालमटोल संभव नहीं रहेगा. एक कानूनी विशेषज्ञ ने कहा कि एमसीसी लागू होते ही जांच अपरिहार्य हो जाएगी. अगर राज्य सरकार जांच में सहयोग नहीं करती, तो यह उसके लिए बड़ा झटका होगा और आयोग सख्त कदम उठा सकता है.
यह विवाद पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर चल रहे तनाव का हिस्सा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आयोग पर आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया अल्पसंख्यकों, गरीबों, SC/ST और युवाओं के मताधिकार छीनने की साजिश है.
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