संजय शर्मा ने सहिया को डायरेक्ट और प्रोडूसर किया है, यह फिल्म पिछले काफी दिनों से सेंसर-बोर्ड में अटकी हुई है. शर्मा ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि आखिर फिल्मों को महीनों तक सेंसर बोर्ड के पास क्यों रोके रखा जाता है और फिल्ममेकर्स को इसकी स्पष्ट वजह क्यों नहीं बताई जाती। उन्होंने दावा किया, “मैं कई लोगों से मिला हूं जिन्होंने मुझे बताया कि उनकी फिल्में पांच या छह महीने तक रुकी रहीं। वे चक्कर लगाते रहे, फिर भी उन्हें कोई वजह नहीं बताई गई कि क्या हो रहा है।” उनके मुताबिक यह सिर्फ उनकी फिल्म की परेशानी नहीं है, बल्कि छोटे फिल्म निर्माताओं के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है।
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सहिया में शांतनु माहेश्वरी, रिंकू राजगुरु और नीरज काबी अहम भूमिकाओं में हैं। पुलिस और नक्सलवाद के संघर्ष की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म की कहानी आम आदिवासी लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो हिंसा और टकराव के बीच फंस जाते हैं। शर्मा का कहना है कि फिल्म न तो नक्सलवाद का समर्थन करती है और न ही हिंसा को बढ़ावा देती है। ऐसे में उन्हें यह समझ नहीं आता कि फिल्म को लेकर इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों चल रही है।
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प्रेस कॉन्फ्रेंस में शर्मा ने अपने पत्रकारिता बैकग्राउंड और न्यूज़ ऑर्गनाइजेशन 4 PM से जुड़े होने को लेकर भी अपनी आशंका जाहिर की। उन्होंने कहा, “मुझे शक है कि ‘4 PM’ नाम मेरे हैरेसमेंट का कारण हो सकता है। शायद कुछ लोगों को इस नाम से एतराज़ है। मुझे पहले भी कई वजहों से हैरेसमेंट का सामना करना पड़ा है। मैं अपने जर्नलिज्म करियर के दौरान सुप्रीम कोर्ट और महाराष्ट्र हाई कोर्ट भी गया था, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि सिर्फ ‘4 PM’ की वजह से मुझे बॉलीवुड में टारगेट किया जाएगा।”
इसके बाद शर्मा ने सवाल उठाया कि अगर किसी को उनसे या उनके पत्रकारिता के काम से परेशानी है, तो उसकी कीमत फिल्म से जुड़े बाकी लोगों को क्यों चुकानी चाहिए। उन्होंने कहा, “आपको मुझसे या ‘4 PM’ से दिक्कत हो सकती है, लेकिन 100 से 200 लोगों की खून-पसीने और मेहनत को दिखाने वाली फिल्म को क्यों रोका जा रहा है? इसके पीछे क्या सोच है?” उनके इस बयान के पीछे वही चिंता नजर आती है कि एक फिल्म सिर्फ उसके निर्देशक की नहीं होती, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले सैकड़ों लोगों की मेहनत भी उससे जुड़ी होती है।
CBFC की स्क्रीनिंग प्रक्रिया में फोन बाहर जमा कराने को लेकर भी शर्मा खासे नाराज नजर आए। उन्होंने सवाल किया, “बंद दरवाज़ों के पीछे कौन सी कॉन्फिडेंशियल बातें हो रही हैं कि फ़ोन बाहर छोड़ने पड़ रहे हैं? कुछ गड़बड़ तो है, है ना? आपको किस बात का डर है? अगर आपको डरने की कोई बात नहीं है, तो खुलकर कहिए। हमारे सामने बैठिए, कैमरा ऑन कीजिए, और बताइए कि फ़िल्म में क्या गलत है—क्या एतराज़ करने लायक है।” शर्मा का कहना है कि फिल्ममेकर्स को आपत्तियों और पूरी बातचीत का रिकॉर्ड मिलना चाहिए, ताकि उन्हें पता हो कि फिल्म में आखिर किस हिस्से पर सवाल उठाया गया है और क्यों।
शर्मा ने RTI के जरिए भी इस प्रक्रिया से जुड़े सवाल पूछने की बात कही है। उनका कहना है, “मैं RTI के जरिए सवाल उठा रहा हूं: फिल्म 51 दिनों तक क्यों नहीं देखी गई? लोगों को यह क्यों नहीं बताया गया कि बोर्ड के कौन से सदस्य फिल्म देख रहे हैं?” इसके साथ ही उन्होंने प्रोड्यूसर को मिलने वाले जवाब को रिकॉर्ड पर रखने की मांग की। अब देखना यह है कि CBFC इस विवाद पर क्या जवाब देता है और क्या सहिया को सर्टिफिकेट मिलता है या मामला वाकई हाई कोर्ट तक पहुंचता है।
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