ईरान को लेकर इजरायल और अमेरिका का रुख एक बार फिर सख्त नजर आ रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के मौजूदा नेतृत्व के साथ किसी कूटनीतिक समझौते की संभावना पर गंभीर संदेह जताया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से तेहरान पर बढ़ाए जा रहे आर्थिक दबाव का भी समर्थन किया है। नेतन्याहू ने मंगलवार देर रात एक कार्यक्रम में यह बात कही है।
नेतन्याहू ने बताया कि हाल ही में ट्रंप के साथ उनकी मुलाकात के दौरान ईरान के साथ बातचीत और कूटनीति के रास्ते पर भी चर्चा हुई थी। हालांकि, उन्होंने कहा कि ईरान के मौजूदा नेतृत्व के साथ किसी समझौते तक पहुंचना उन्हें मुश्किल लगता है। उन्होंने ईरानी नेतृत्व के लिए बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इस समूह के साथ कोई समझौता हो सकता है।
गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति तैयार की है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस सप्ताह तेहरान की आर्थिक गतिविधियों को कमजोर करने के लिए नए कदमों की जानकारी दी। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान के साथ वित्तीय लेनदेन में मदद करने वाली संस्थाओं के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
बेसेंट ने चेतावनी दी कि ईरान की ओर से धन को अवैध तरीके से स्थानांतरित करने में मदद करने वाली किसी भी संस्था को अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से बाहर किया जा सकता है। अमेरिका का यह कदम उन देशों और संस्थाओं पर भी दबाव बढ़ा सकता है जो ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, यह आर्थिक दबाव ईरान के साथ चल रहे लंबे सैन्य टकराव के बीच बढ़ाया गया है। संघर्ष को करीब छह महीने हो चुके हैं, लेकिन स्थिति किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंची है। शांति वार्ता भी ठहरी हुई है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ईरान ने अमेरिका की नई रणनीति को लेकर ज्यादा चिंता नहीं जताई है। ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनीजादेह ने कहा कि उनका देश इस तरह के कदमों की लंबे समय से उम्मीद कर रहा था और सरकार ने इन परिस्थितियों से निपटने के लिए दो साल की योजना तैयार कर रखी है। उन्होंने अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान के तैयार रहने का दावा किया है।
बता दें कि ईरान पहले भी कई वर्षों तक अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता रहा है। इसके बावजूद उसने अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय वित्तीय माध्यमों का इस्तेमाल करते हुए अपना व्यापार जारी रखा है। युद्ध शुरू होने से पहले भी ईरान प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चा तेल निर्यात कर रहा था, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन को जाता था।
ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका के आर्थिक कदम, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और रुकी हुई कूटनीतिक बातचीत यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कि ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव कम होता है या टकराव और गहराता है।
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