गौरतलब है कि खामेनेई की मृत्यु 28 फरवरी को तेहरान पर अमेरिकी और इजराइली हमलों में हुई थी। इस हमले में ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारी भी मारे गए थे। भारत ने खामेनेई की मृत्यु पर पहले ही संवेदना व्यक्त की थी। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर भी किए थे। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस अंतिम संस्कार समारोह में शामिल होंगे? यदि भारत के पिछले कूटनीतिक व्यवहार और वर्तमान वैश्विक समीकरणों को देखा जाए तो संभावना यही दिखाई देती है कि भारत अत्यंत सतर्क और संतुलित रास्ता अपनाएगा। संभव है कि भारत प्रधानमंत्री स्तर पर प्रतिनिधित्व न भेजे और किसी वरिष्ठ मंत्री या विशेष दूत को समारोह में शामिल होने के लिए भेजे।
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इसके पीछे कई कारण हैं। पहला कारण भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति है। भारत एक ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और सामरिक संबंध बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी ओर अमेरिका और इजराइल के साथ भी उसके गहरे रणनीतिक संबंध हैं। आज भारत रक्षा, प्रौद्योगिकी, निवेश और भू रणनीतिक सहयोग के मामले में अमेरिका और इजराइल दोनों के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री का तेहरान जाकर उस नेता के अंतिम संस्कार में शामिल होना, जिसकी मृत्यु अमेरिकी और इजराइली हमले में हुई हो, एक मजबूत राजनीतिक संकेत माना जाएगा। भारत शायद ऐसा संदेश देने से बचेगा।
दूसरा कारण पश्चिम एशिया में भारत की व्यावहारिक नीति है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में किसी एक खेमे का हिस्सा बनने से बचता आया है। चाहे सऊदी अरब हो, संयुक्त अरब अमीरात हो, इजराइल हो या ईरान, भारत ने सभी के साथ अलग अलग हितों के आधार पर संबंध बनाए रखे हैं। यही भारत की स्वतंत्र कूटनीति की पहचान भी है। भारत जानता है कि पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं, वहां से ऊर्जा आपूर्ति होती है और व्यापारिक हित भी जुड़े हैं। इसलिए वह किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहेगा जिससे किसी एक पक्ष को स्पष्ट समर्थन का संदेश जाए।
देखा जाये तो ईरान से मिले निमंत्रण पर फैसला कर पाना भारत के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में उसने खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को अभूतपूर्व स्तर तक मजबूत किया है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों के साथ भारत की ऊर्जा, निवेश और सामरिक साझेदारी लगातार गहरी हुई है। यही वजह है कि जब ईरानी हमलों से खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा था तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई खाड़ी देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बातचीत कर ऐसे हमलों को अस्वीकार्य बताया था और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया था। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री स्वयं तेहरान जाकर उस नेतृत्व के अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं जिसे लेकर पश्चिम एशिया की राजनीति पहले से ध्रुवीकृत है, तो इससे भारत के हाल के कूटनीतिक संदेशों को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसी कारण अधिक संभावना इस बात की मानी जा रही है कि भारत सम्मान और संतुलन दोनों बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री की जगह किसी वरिष्ठ प्रतिनिधि को भेजने का रास्ता चुन सकता है।
वैसे ऐसा भी नहीं है कि भारत ईरान को नजरअंदाज करेगा। चाबहार बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा और मध्य एशिया तक पहुंच जैसे कई महत्वपूर्ण रणनीतिक हित भारत को ईरान से जोड़ते हैं। अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक बिना पाकिस्तान के रास्ते पहुंचने के लिए ईरान भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत ईरान के साथ संवाद और सम्मान का रिश्ता बनाए रखेगा और संभव है कि भारत एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजकर यह संदेश दे कि वह ईरान की संवेदनाओं को समझता है, लेकिन साथ ही वह किसी टकराव की राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगा।
अब सवाल यह भी है कि ईरान ने भारत को यह निमंत्रण देकर आखिर कौन-सी कूटनीति साधने की कोशिश की है? दरअसल ईरान इस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए व्यापक समर्थन और नैतिक वैधता जुटाने में लगा है। अमेरिका और इजराइल के साथ टकराव के बीच ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह अकेला नहीं है और दुनिया के प्रभावशाली देश उसके साथ संवाद बनाए हुए हैं। भारत जैसे वैश्विक शक्ति केंद्र को निमंत्रण देकर ईरान यह संदेश देना चाहता है कि वैश्विक स्तर पर उसकी स्वीकार्यता बनी हुई है।
इसके अलावा, ईरान भारत की उस छवि का भी उपयोग करना चाहता है जो गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति वाले देश की रही है। यदि भारत का कोई उच्च स्तरीय प्रतिनिधि तेहरान पहुंचता है तो ईरान इसे अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत करेगा। इससे पश्चिम एशिया के शिया समुदायों और ईरान समर्थक देशों के बीच भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि भारत ने कठिन समय में ईरान से दूरी नहीं बनाई।
बहरहाल, इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह साफ दिखाई देता है कि किसी दूसरे देश के हमले में मारे गए शीर्ष नेताओं के अंतिम संस्कार में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की मौजूदगी अक्सर नहीं रही है। हालांकि कुछेक उदाहरण जरूर मिलते हैं जैसे वर्ष 2020 में अमेरिकी हमले में मारे गए ईरानी सेनापति कासिम सुलेमानी के अंतिम संस्कार में इराक, सीरिया और लेबनान के कई शीर्ष नेता और प्रतिनिधि शामिल हुए थे। इसी तरह वर्ष 1986 में अमेरिकी बमबारी में मारे गए लीबिया के लोगों के प्रति संवेदना जताने कई देशों के प्रतिनिधिमंडल त्रिपोली पहुंचे थे। इतिहास बताता है कि ऐसे समारोह केवल शोक प्रकट करने के मंच नहीं होते, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन और राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन जाते हैं। इसलिए यदि भारत ईरान में किसी उच्च स्तरीय प्रतिनिधि को भेजता है तो उसे केवल धार्मिक या मानवीय उपस्थिति नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जाएगा। इसलिए भारत संभवतः ऐसा रास्ता चुनेगा जिसमें ईरान के प्रति सम्मान भी बना रहे और अमेरिका तथा इजराइल के साथ उसके रणनीतिक संबंधों पर भी कोई प्रतिकूल असर न पड़े। यही भारत की परिपक्व और स्वतंत्र कूटनीति की असली पहचान भी है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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