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- Think A Little Above Average, Stay Grounded; Avoid The Blind Race And Satisfaction Is Assured.
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वैज्ञानिक कहते हैं, ‘जब हम किसी की सफलता देखते हैं, तो हम उसकी आधी अधूरी कहानी ही देख रहे होते हैं। असली समझदारी इसमें है कि मौकों के हिसाब से अपनी महत्वाकांक्षा तय करें-औसत से हमेशा थोड़ा ऊपर सोचें, पर अंधी दौड़ का हिस्सा बनने से बचें। – प्रतीकात्मक फोटो
चांद छूने का लक्ष्य रखो। चूक भी गए, तो सितारों के बीच जरूर उतरोगे।’ सकारात्मक सोच के जनक नॉर्मन विंसेंट पील की यह सीख चर्चित है। इसके उलट, एक कहावत है- ‘बेहतर की चाहत, अच्छे की दुश्मन होती है।’ ऐसे में सवाल उठता है कि इंसान को कितना महत्वाकांक्षी होना चाहिए? क्या ऊंची सोच सही होती है, या फिर जो मिल रहा है उसी में संतोष कर लेना चाहिए?
वैज्ञानिकों ने इसका गणितीय फॉर्मूला खोज लिया है। इसे श्रेष्ठतम स्थिति कहा जा रहा है। जैव अर्थशास्त्री मैथ्यू बर्गस और स्टैनफोर्ड एक्सपर्ट एकातेरिना लैंडग्रेन ने कंप्यूटर आधारित ‘मॉडल’ बनाया। इसमें एजेंट्स को अलग-अलग मौके और पुरस्कार खोजने दिए गए। नतीजे बताते हैं कि बेहतरीन नतीजे तब मिलते हैं जब महत्वाकांक्षा औसत से थोड़ी ऊपर हो, पर असीमित नहीं। अगर उम्मीदें बहुत कम हों तो मौके छूट जाते हैं, और बहुत ज्यादा हों तो नुकसान होता है। थोड़ा-सा संतोष ही सफलता का संतुलन बनाता है।
डॉ. एकातेरिना कहती हैं, कुछ समय पहले अकादमिक हलकों में एक मीम वायरल हुआ था…‘सीवी ऑफ फेलियर्स’। इसमें एक सफल अर्थशास्त्री ने उन सभी नौकरियों व प्रोजेक्ट्स की सूची बनाई थी, जिन्हें वह हासिल नहीं कर पाए थे। वैज्ञानिक कहते हैं, ‘जब हम किसी की सफलता देखते हैं, तो हम उसकी आधी अधूरी कहानी ही देख रहे होते हैं। असली समझदारी इसमें है कि मौकों के हिसाब से अपनी महत्वाकांक्षा तय करें-औसत से हमेशा थोड़ा ऊपर सोचें, पर अंधी दौड़ का हिस्सा बनने से बचें। जीवन में आगे बढ़ने और रुकने के बीच का यही संतुलन आपको असली कामयाबी दिलाएगा।
इंसान अवसरों का सही अनुमान नहीं लगा पाते
इलिनॉय यूनिवर्सिटी के इकोलॉजिस्ट जेम्स ओ’डायर कहते हैं,‘आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इंसान अवसरों और सफलताओं का सही अनुमान नहीं लगा पाते। प्रकृति में जीव-जंतु भोजन की उपलब्धता समझ लेते हैं, पर इंसानों के पास सोशल मीडिया है। सोशल मीडिया पर पर दूसरों की सफलता देखकर लगता है कि सब बेहतर कर रहे हैं, सिवाय आपके। यह भ्रम महत्वाकांक्षा को बढ़ा देता है और इंसान अंधी दौड़ में भागता रहता है, जहां संतोष खो जाता है और वक्त खत्म हो जाता है।’
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