पूरे देश में होली, रंग और उल्लास का त्योहार है। बासंती बयार के बीच दस्तक देने वाले इस त्योहार के वक्त समूचा देश रंगों में डूबता रहा है। लेकिन महानगरीय असर में अब रंगों की चमक और उल्लास कहीं खोती हुई नजर आ रही है। हास्य और लास्य का भी त्योहार है होली, लेकिन अब पूर्वांचल में हास्य की जगह फूहड़ता ने ले ली है, लास्य की लय भी कहीं खो गई है। अब पूर्वांचल का शायद ही कोई गांव बचा हो, जहां पारंपरिक भोजपुरी रंग में फाग के राग सुनाई देते हों। कभी भंग के संग होली का रंग चढ़ता था, अब भांग की जगह आधुनिक अंगूर की बेटी ने ले ली है। चूंकि अंगूर की बेटी तक सबकी पहुंच नहीं, इसलिए सरकारी ठेके का पौव्वा आज की होली के उल्लास का सबसे बड़ा साथी नजर आ रहा है।
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पूर्वांचल में होली को फगुआ भी कहा जाता है। भोजपुरिया इलाके में आज से तीन दशक पहले तक लोग परदेस में नौकरी कर रहे लोग ‘होली’ की छुट्टी पर नहीं, ‘फगुआ’ की छुट्टी पर आते थे। जैसे ही खेतों में फसलें गोटाने लगती थीं, यानी उनके दानों का दूध गाढ़ा होकर अन्न का रूप लेने लगता था, बहरवांसु यानी बाहर कमाने गए लोगों के इंतजार की घड़ियां गिनी जाने लगती थीं। जब परदेसी कमासुत यानी कमेरा घर लौटता, घर ही नहीं, पूरे मोहल्ले में हर्ष की लहर दौड़ जाती थी। होली पर नवेली भौजाइयों को रंगने के लिए घेरने के उपाय सोचे जाने लगते, वहीं नवोढ़ा भाभियां भी देवरों पर आक्रमण का इंतजार करने लगतीं। देवर जी थोड़े भी लापरवाह हुए नहीं कि छपाक..और पूरा बदन भाभी के हाथों की मिठास भरे रंगों से सराबोर..
पूर्वांचल में फगुआ का त्योहार महाशिवरात्रि के बाद से छिटफुट शुरू हो जाता था। किंचित अब भी होता है। लेकिन अब पहले जैसी गाढ़ी चाहत अब नहीं रही। हर उम्र की भाभियां अपने-अपने देवरों को रंगने की जुगत में जुट जाती थीं, इसके लिए वक्त की परवाह नहीं होती थी। रात का भोजन करते वक्त हर उम्र के देवर भौजाइयों के सबसे ज्यादा शिकार बनते थे..इसलिए उन दिनों कई लोग बेहद सावधानी बरतते थे..हालांकि सावधानी अक्सर हट जाती थी और रंग रूपी दुर्घटना का हमला हो जाता था।
होली के दिन पहले कच्चे बांस की खोखली नलियों से पिचकारी बनाई जाती थी। कोई-कोई ऐसा होता था, जिसके पास लोहे या पीतल की पिचकारी होती। अन्यथा ज्यादातर लोगों के पास बांस की पिचकारी होती, जिसका पंच किसी लकड़ी पर कपड़े लपेटकर बनाया जाता था। देसज बढ़ई इन पिचकारियों को तैयार करते थे। लेकिन अब ये पिचकारियां बीते दिनों की बात हो गई हैं। अब प्लास्टिक ने घर-घर जगह बना ली है।
पूर्वांचल में सवर्ण मोहल्लों की होली और दलित या मजदूर मोहल्लों की होली में किंचित अंतर होता था। दलित या मजदूर मोहल्ले से होली के मौसम में अच्छे-भले लोग गुजरने से परहेज करते थे। कारण यह कि कब ठाकुर साहब या पंडिजी की चमकती धोती पर गोबर या नाले का कीचड़ छपाक से आ गिरे, कोई गारंटी नहीं। इसका बुरा कोई-कोई ही मानता था। आज ऊंच-नीच की बातें बहुत होती हैं। लेकिन तीन दशक पहले तक कम से कम होली में जमींदार हो या पुरोहित या बड़े ठाठ वाले ठाकुर साहब, दलित या कमेरी बस्तियों की ओर काम से भी गुजरने से परहेज करते थे, क्योंकि गोबर, कीचड़, कूड़ा कुछ भी उनके स्वागत में उन पर बरस सकता था। ज्यादातर ये हमले उन मोहल्लों की महिलाएं ही करतीं।
फगुआ के दिन पूर्वांचल में सुबह हर मोहल्ले में रंग-पानी की होली होती। हर दरवाजे पर झंड बनाकर पहुंचते, एक-दूसरे को रंग लगाते और पुए खाते हुए दूसरे दरवाजे का रूख करते। इस दौरान शौकीन लोगों को भंग की ठंडाई भी मिलती, हालांकि तब भी भांग खाने या उसकी ठंडाई पीने वालों की संख्या बहुत कम होती। दलित और कमेरा बस्तियों में रंग और पानी के साथ गोबर और कीचड़ भी जुड़ जाता। जिस समय दरवाजे के बाहर होली का रंग बरस रहा होता या कीचड़ की बौछार हो रही होती, उस समय घरों में अपने-अपने इष्ट देवताओं और कुल देवताओं की पूजा हो रही होती है। यह परंपरा अब भी बदस्तूर जारी है। इस पूजा में कहीं पुए तो कहीं आटे का पीठा चढ़ाया जाता है। ये पुए भी पूरी पवित्रता से तैयार किए गए गेहूं के आटे और गुड़ से बनाए जाते हैं। इन पुओं को देसी गाय के घी में ही तला जाता है। उसे ही देवताओं को भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद घर की महिलाएं होली खेलती हैं। रिश्ते के देवरों को भी घरों में प्रवेश की इजाजत तभी मिलती है, जब उसकी रिश्ते की भाभी घर में हो।
दोपहर तक रंग और पानी का खेल चलता है। उसके बाद तालाब, नदी या ट्यूबवेल पर स्नान का त्योहार चलता है। स्नान के बाद पूर्वांचल के लोग अपने घरों को लौटते हैं और घर में बने पकवान का भोजन करते हैं। फगुआ पर पूर्वांचल में हर घर में पुए बनना जरूरी है। इसके साथ ही कटहल की सब्जी भी तकरीबन हर रसोई में बनती है। पूड़ी और चावल भी लोग बनाते खाते हैं। इसलिए इस दौरान पूर्वांचल के बाजारों में कटहल की कीमत और दिनों की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
फगुआ के दिन शाम को पूर्वांचल में नए कपड़े पहनने का चलन है। नए कपड़े पहन लड़कों का झुंड अबीर की पोटलियां लेकर निकल पड़ता है। इसकी शुरूआत घर के बड़े-बुजुर्गों के पैर पर अबीर रखकर प्रणाम करने से होती है। बराबरी के लोगों के चेहरे पर अबीर पोता जाता है। देवर-भौजाई के बीच भी कुछ इसी अंदाज में अबीर की सूखी होली खेली जाती है। इसी तरह नए कपड़े पहनकर लड़कियों का झुंड भी अबीर की पोटली के साथ पूरे गांव के लिए निकल पड़ती हैं। पूर्वांचल में गांव के लड़के-लड़कियों को भाई-बहन माना जाता है। चाहे वे किसी भी बिरादरी के हों, इसलिए उनके बीच देवर-भाभी जैसी होली खेलना समाज और परंपरा विरुद्ध माना जाता है। लड़कियां झुंड में घर-घर जाती हैं, अबीर लगाती हैं, इस दौरान लोगों को सूखे मेवे और गुझिया खिलाने का चलन है।
पहले के दौर में शाम के वक्त ढोल-मजीरे के साथ पारंपरिक होली गीत गाने का चलन था। भोजपुरी इलाके के कुछ मशहूर फाग गीत हैं,
अवध में होरी खेले रघुबीरा, अवध में होरी खेले रघुबीरा
केकरा हाथे कनक पिचकारी, केकरा हाथे अबीरा, अवध में होरी खेले रघुबीरा।
राम के हाथे कनक पिचकारी, लछुमन हाथे अबीरा, अवध में होरी खेले रघुबीरा।
यानी अवध में राम अपने भाइयों के साथ होली खेल रहे हैं। किसके हाथ में सोने की पिचकारी है और किसके हाथ में अबीर है। राम के हाथ में सोने की पिचकारी है और लक्ष्मण के हाथ में अबीर है। अवध में इस तरह भाइयों संग राम होली खेल रहे हैं।
पूर्वांचल के पारंपरिक होरी गीतों में सौंदर्य छलक-छलक उठता है। इन गीतों में सौंदर्य के देसी उपमान रहे हैं, जैसे-
गोरिया पातरि हो,
जइसे लचके लवंगिया के डार
गोरिया पातरि हो.
यानी गोरी इतनी पतली है, जैसे लौंग की डाल है। जिस तरह लौंग की डाल थोड़ी सी हवा की वजह से भी लचकती है, वैसे ही गोरी की कमर भी लचक रही है।
पूर्वांचल के फाग गीतों में भक्ति भी है और हास्य भी और लास्य भी
गंगा जी को समर्पित पूर्वांचली होरी गीत को देखिए,
सुरसरि नांव तोहार, आहो लाल सुरसरि नांव तोहार
अबकी…आहे अबकी पार उतार गंगा मइया
सुरसरि नांव तोहार , आहो लाल सुरसरि नांव तोहार
गंगा जी आपका नाम ठीक ही सुरसरि है , सुर यानी देवताओं की नदी। आप सबको पार लगाती है, इस बार आप मेरी जीवन नैया को पार लगा दो।
पहले के दौर में ढोल-मंजीरों के साथ हर दरवाजे पर गायकों की टीम पहुंचती थी, उनका पान, लौंग और अबीर से स्वागत होता था..इस दौरान कुछ गांवों में हर दरवाजे से कुछ पैसे भी लिए जाते थे। उन पैसों को इकट्ठा करके सामाजिक कार्य के लिए सार्वजनिक सामान खरीदे जाते थे, जिनका उपयोग शादी-विवाह, मुंडन-जनेऊ में किया जाता था।
इस गायन की शुरूआत आम तौर पर गांव के डीह बाबा के स्थान से होती थी। पूर्वांचल में गांव का डीह बाबा गांव के कुल देवता को या गांव के रक्षक को कहा जाता है। वैसे इस गीत की शुरूआत बसंत पंचमी के दिन होती थी, जिसे ताल ठोकना कहा जाता है। होली की रात को जब तकरीबन पूरे गांव की यह गायक टोली परिक्रमा पूरी कर लेती तो आखिरी ताल ठोकने गांव के किसी प्रतिष्ठित मंदिर पर जाती और वहां होरी के भक्ति गीत गाने के बाद आखिरी गीत चैता गाया जाता था। वह मंदिर हनुमान जी का भी हो सकता है या शंकर जी का भी…हर गांव में ऐसी प्रतिष्ठा अलग-अलग मंदिरों की रही है।
पूर्वांचल में कुछ खास जातियों के अपने होरी गीत रहे हैं। उनकी अपनी लय और ताल भी रही है। कहीं-कहीं यह परंपरा आज भी जिंदा है। जैसे धोबी समुदाय का अपना गीत है तो गोंड़ समुदाय का अपना। उनके अपने वाद्य भी हैं। धोबी समुदाय पखावज के साथ मजीरे की ताल पर गीत गाता रहा है तो गोंड़ समाज हुड़का और बड़े-बड़े मजीरे के ताल पर अपनी लय छेड़ता रहा है। एक प्रसिद्ध धोबी गीत अब भी याद आता है, जिसमें सौंदर्य के अनुपम देसज रूप दिखते हैं,
लाल चोटी बान्हावा रे भउजी
लाल चोटी बान्हवा
यानी भौजाई, तुम लाल चोटी ही बांधों..उसमें तुम बहुत सुंदर लगती हो।
हर गायन दल अपने हिसाब से जोगीरा भी गाता रहा है। अब भी किंचित गाया जाता है। लेकिन सबका समापन किसी न किसी मंदिर पर ही होता है…और इसके साथ ही पूर्वांचल की होरी का त्योहार पूरा हो जाता था, अगले साल तक के लिए उसका इंतजार शुरू हो जाता था।
– उमेश चतुर्वेदी
पूर्वांचल के मूल निवासी वरिष्ठ पत्रकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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