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- Taslima Nasrin Returns To Kolkata After 19 Years | Home Coming Statement
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तसलीमा को 2007 में विरोध प्रदर्शनों के कारण कोलकाता छोड़ना पड़ा था।
निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन 19 साल बाद कोलकाता लौटी हैं। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए अपने देश लौटने जैसा है। तस्लीमा 1 अगस्त को एक कार्यक्रम में शामिल होंगी। इसमें पश्चिम बंगाल के CM सुवेंदु अधिकारी और लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय के भी शामिल होने की संभावना है।
2007 में छोड़ना पड़ा था शहर
तस्लीमा 2007 के बाद पहली बार कोलकाता में सार्वजनिक रूप से दिखाई देंगी। साल 2003 में उनकी किताब ‘द्विखंडित’ पर पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। उन पर मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को आहत करने का आरोप था। इसके बाद 2007 में विरोध प्रदर्शनों के कारण उन्हें वह शहर छोड़ना पड़ा, जिसे उन्होंने बांग्लादेश से भागने के एक दशक बाद अपना घर बनाया था।
बंगाल मेरे दिल में कभी नहीं बंटा
न्यूज एजेंसी PTI से बातचीत में तस्लीमा ने कहा कि कोलकाता सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि अपनापन महसूस कराने वाला शहर है। उन्होंने कहा, ‘मेरे दिल में बंगाल कभी किसी सीमा या कटीले तारों से नहीं बंटा। पूर्वी बंगाल के दरवाजे मेरे लिए बंद हैं, इसलिए फिलहाल बंगाल का यह हिस्सा ही मेरा घर है।’ उन्होंने कहा कि वह खुशी और दर्द दोनों के साथ लौट रही हैं।
लेखक की आजादी के लिए संघर्ष
तस्लीमा ने अपनी वापसी को एक लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी के संघर्ष से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा, ’19 साल बाद कोलकाता में सार्वजनिक रूप से बोलना अवास्तविक लगता है। यह उस आवाज की वापसी है जिसे कट्टरपंथियों ने दबाने की कोशिश की थी। मेरी मौजूदगी यह साबित करेगी कि फतवे और धमकियां लेखक को कुछ समय के लिए निर्वासित कर सकती हैं, लेकिन उसके विचारों को मिटा नहीं सकतीं।’
सरकार और आयोजकों का जताया आभार
लेखिका ने अपनी यात्रा को संभव बनाने के लिए आयोजकों और सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार का आभार जताया। उन्होंने कहा, ‘मैं सीएम सुवेंदु अधिकारी की उस इच्छाशक्ति की सराहना करती हूं, जिसमें वे एक असहमत लेखक की आजादी का सम्मान और सुरक्षा कर रहे हैं, भले ही वे मेरी हर बात से सहमत न हों।’
तकनीक से बढ़ीं चुनौतियां
तस्लीमा ने कहा कि तकनीक ने लेखकों को बोलने के नए मौके दिए हैं, लेकिन इससे डराने-धमकाने के नए तरीके भी पैदा हुए हैं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष सोच और धार्मिक आलोचना के लिए जगह खतरनाक रूप से कम हो गई है। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में धार्मिक कट्टरपंथ ने नई राजनीतिक ताकत और प्रचार के तरीके अपना लिए हैं।
युवाओं से की सवाल पूछने की अपील
तस्लीमा ने युवा पाठकों और लेखकों से स्थापित विचारों पर सवाल उठाने और बौद्धिक स्वतंत्रता की रक्षा करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘मेरा संदेश है कि हर चीज पर सवाल उठाएं। धर्म, परंपरा, सत्ता और राजनीति पर सवाल करें। किसी और के पूर्वाग्रहों को अपनी धारणा न बनाएं।’ उन्होंने उम्मीद जताई कि यह दौरा एक बार की घटना बनकर नहीं रहेगा और वह जब चाहें कोलकाता लौट सकेंगी।
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