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अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था।
अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।

ट्रॉय मिंक ने सोमवार को मैरीलैंड में आयोजित एयर, स्पेस एंड साइबर कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी अंतरिक्ष क्षमताओं को लेकर यह जानकारी दी।
रूस-चीन के लिए क्यों अहम है यह खुलासा?
अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं।
सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं।
ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं।
वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं।
अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा
अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके।
अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत बढ़ा रहा
अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है।
इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है।
अगर अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा
अंतरिक्ष में सैन्य टकराव का असर सिर्फ सैनिकों और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आज दुनिया की कई जरूरी सेवाएं सैटेलाइट पर निर्भर हैं।
मौसम की जानकारी, प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी, नेविगेशन और संचार जैसे कामों में सैटेलाइट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
GPS जैसी नेविगेशन सेवाओं का इस्तेमाल विमान, जहाज, ट्रक और दूसरी परिवहन सेवाओं में होता है। बैंकिंग और वित्तीय सिस्टम में भी सटीक समय और संचार के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
अगर बड़े पैमाने पर सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जाता है तो संचार, नेविगेशन और कई जरूरी नागरिक सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
यही वजह है कि अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती तैनाती को सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक
अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के अमेरिकी खुलासे के बीच 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है।
अमेरिका, सोवियत संघ और कई दूसरे देशों ने करीब 60 साल पहले यह संधि की थी। इसका मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के दूसरे हथियारों की तैनाती से बचाना था।
संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या दूसरे सामूहिक विनाश के हथियार रखने पर रोक लगाई गई है।
हालांकि, इसमें हर तरह के पारंपरिक हथियारों को अंतरिक्ष में तैनात करने पर पूरी तरह रोक नहीं है। इसलिए अमेरिका के मौजूदा बयान से सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने इस संधि का उल्लंघन किया है।
लेकिन अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में तैनात किए गए ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ किस श्रेणी के हथियार हैं। इसलिए इनकी वास्तविक प्रकृति सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से इनकी स्थिति क्या है।
ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी रक्षा रणनीति में और ज्यादा महत्व दिया है।
ट्रम्प ने अमेरिकी अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को आधुनिक बनाने पर जोर दिया है। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिका का लक्ष्य ऐसी मिसाइल रक्षा व्यवस्था तैयार करना है जो अलग-अलग तरह के मिसाइल हमलों से देश की रक्षा कर सके। इसके लिए जमीन और अंतरिक्ष आधारित तकनीकों के इस्तेमाल पर काम किया जा रहा है।
मिंक ने सोमवार को यह भी बताया कि अमेरिका का स्पेस-बेस्ड इंटरसेप्टर प्रोग्राम तेजी से आगे बढ़ा है। उनके मुताबिक, यह प्रोग्राम शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक एक साल से भी कम समय में पहुंच गया।
हालांकि, उन्होंने इस प्रोग्राम की तकनीकी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की।
अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा का नया दौर
अमेरिका के इस खुलासे से एक बात साफ है कि अंतरिक्ष अब सिर्फ सैटेलाइट, संचार और वैज्ञानिक शोध का क्षेत्र नहीं रह गया है।
अमेरिका, रूस और चीन तीनों अंतरिक्ष को अपनी सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मान रहे हैं। तीनों देश अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं और इसी के साथ अंतरिक्ष में संभावित सैन्य टकराव का खतरा भी बढ़ रहा है।
ऐसे में मिंक का बयान सिर्फ अमेरिकी सैन्य क्षमता का खुलासा नहीं है। इसे रूस और चीन के लिए यह संकेत भी माना जा रहा है कि अमेरिका अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहा है और जरूरत पड़ने पर अपने सिस्टम की रक्षा के लिए इनका इस्तेमाल करेगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका ने ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए हैं और उनकी वास्तविक क्षमता कितनी है। मिंक ने इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।
लेकिन पहली बार सार्वजनिक रूप से हथियारों की मौजूदगी स्वीकार किए जाने से इतना जरूर स्पष्ट हो गया है कि अंतरिक्ष अमेरिका, रूस और चीन के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा का अहम मोर्चा बन चुका है।
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