UK के एकजुट रहने पर फिर सवाल उठ रहे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले हैं। तीनों की मांग अलग-अलग है, लेकिन सभी UK की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव चाहते हैं। तीनों क्षेत्रों के फर्स्ट मिनिस्टर लोगों को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार देने पर साझा बयान जारी कर सकते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर आजादी या UK से अलग होने जैसे बड़े फैसलों पर जनमत संग्रह कराने की बात भी हो सकती है। स्कॉटलैंड: यहां की सत्ताधारी SNP स्कॉटलैंड को UK से अलग कर स्वतंत्र देश बनाना चाहती है। वेल्स: राष्ट्रवादी पार्टी प्लाइड कम्री वेल्स को अलग देश बनाने की मांग करती है और ज्यादा अधिकार चाहती है। नॉर्दर्न आयरलैंड: सत्ताधारी सिन फेन UK से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ने के पक्ष में है। पार्टी की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी बैठक में शामिल होंगी। तीनों हिस्से मिलकर UK पर बनाएंगे दबाव ब्रिटेन की केंद्र सरकार देश को एकजुट रखने के पक्ष में है। लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार ब्रिटेन की केंद्र सरकार UK को एकजुट रखना चाहती है। वहीं स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार देने और व्यवस्था में बदलाव की मांग उठ रही है। द टेलीग्राफ के मुताबिक, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रुन एपी इओर्थवर्ट के साथ नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता भी साझा बयान का समर्थन कर सकते हैं। ब्रिटिश PM के बयान पर विवाद स्कॉटलैंड की आजादी इस पूरी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल ही में कहा था कि अगर स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में आजादी के पक्ष में लोगों के बीच सहमति बनती है, तो एक और जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है। SNP ने बर्नहम के इस बयान को तुरंत मुद्दा बना लिया। इसके बाद में बर्नहम को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने चिट्ठी लिखकर कहा कि अगले आम चुनाव से पहले आजादी पर जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा। स्विनी – UK पर एकजुट रहने का दबाव बढ़ा स्विनी ने बर्नहम के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे फर्स्ट मिनिस्टर हैं जो आजादी के पक्ष में हैं। उनके मुताबिक, इससे साफ है कि ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। वहीं, वेल्स में भी ज्यादा अधिकार की मांग तेज हो गई है। मई में हुए चुनाव में वहां ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली पार्टियों को मजबूती मिली है।
96 सीट पर हुए चुनाव में अलग देश की समर्थक प्लाइड कम्री को 43 जबकि लेबर पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। इस चुनाव के बाद प्लाइड कम्री के रुन एपी इओर्थवर्ट वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर बने। ट्रम्प के बयान से आयरलैंड के एकीकरण की चर्चा बढ़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाल में आयरलैंड के एकीकरण पर बयान दिया है। शनिवार को डबलिन दौरे के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपतियों का इस मुद्दे पर आमतौर पर सावधानी भरा रुख रहा है। ऐसे में ट्रम्प का बयान इस बहस को और चर्चा में ले आया है। मामला सिर्फ आजादी का नहीं, पैसा और यूरोप भी अहम कार्डिफ की बैठक सिर्फ ब्रिटेन से अलग होने की मांग तक सीमित नहीं है। तीनों जगहों की कई प्रमुख पार्टियां यूरोपीय यूनियन के साथ करीबी रिश्तों की समर्थक हैं। UK 2020 में आधिकारिक तौर पर यूरोपीय यूनियन से आजाद हो गया था। इसके लिए 2016 में वोटिंग हुई थी। अगर स्कॉटलैंड या वेल्स भविष्य में आजाद होते हैं, तो वे EU की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं अगर नॉर्दर्न आयरलैंड आयरलैंड में शामिल होता है, तो वह EU का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से EU का सदस्य है। अब जानिए कि ये तीनों इलाके ब्रिटेन से कैसे जुड़े और अब अलग होने की मांग क्यों हो रही है… स्कॉटलैंड: महारानी की मौत के बाद इंग्लैंड से जुड़ा करीब 300 साल पहले स्कॉटलैंड और इंग्लैंड दो अलग-अलग देश थे। दोनों के अपने राजा, संसद और कानून थे। साल 1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मौत हो गई। उनका कोई वारिस नहीं था। तब स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बन गए। यानी अब एक ही व्यक्ति दो देशों का राजा था, लेकिन दोनों देश फिर भी अलग-अलग थे। इसके करीब 100 साल बाद बड़ा फैसला हुआ। 1707 में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की संसद ने समझौता किया। दोनों देश मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बन गए। इसके बाद दोनों की अलग-अलग संसद नहीं रही और एक साझा संसद बनी। अलग देश बनने की मांग कब तेज हुई वेल्स: इंग्लैंड के साथ जुड़ा, लेकिन पहचान नहीं छोड़ी 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा कर लिया। इसके बावजूद वेल्स ने अपनी भाषा, संस्कृति और अलग पहचान बनाए रखी। 19वीं-20वीं सदी में इन्हें बचाने के आंदोलन तेज हुए। 1925 में प्लाइड कम्री पार्टी बनी। शुरुआत में इसका फोकस वेल्श भाषा और संस्कृति बचाने पर था, लेकिन बाद में पार्टी ने वेल्स को ज्यादा अधिकार और फिर अलग देश बनाने की मांग शुरू कर दी। 1999 में वेल्स को अपनी संसद और सरकार मिली। हालांकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े फैसले अब भी UK सरकार के पास हैं। स्कॉटलैंड के मुकाबले वेल्स में आजादी का समर्थन कम है, लेकिन प्लाइड कम्री लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है। नॉर्दर्न आयरलैंड: आयरलैंड से जुड़ने की मांग बढ़ी वेल्स, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन चुके थे। 1801 में आयरलैंड भी इसमें शामिल हो गया। हालांकि शुरुआत से ही आयरलैंड के कई हिस्से में इसका विरोध जारी रहा। लंबे संघर्ष के बाद 1922 में आयरलैंड का ज्यादातर हिस्सा UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा यानी नॉर्दर्न आयरलैंड UK के साथ ही रहा। नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन के समर्थकों को यूनियनिस्ट कहा जाता है। ये ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग थे। दूसरी तरफ आयरिश राष्ट्रवादी और ज्यादातर कैथोलिक समुदाय था, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहता था। आज भी नॉर्दर्न आयरलैंड में दो तरह की सोच मौजूद है। कुछ लोग UK के साथ रहना चाहते हैं, जबकि कुछ आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते हैं। नॉर्दर्न आयरलैंड के पास आयरलैंड से जुड़ने का रास्ता
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