उत्तराखंड सरकार राज्य में संस्कृत भाषा को संरक्षित और समृद्ध करने तथा इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक संस्कृत आयोग बनाने की योजना बना रही है। सरकार ने इस आयोग के लिए देश भर के संस्कृत विद्वानों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों, गुरुकुलों और संस्कृत प्रेमियों से 10 अगस्त तक ईमेल के ज़रिए सुझाव मांगे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड की विरासत में संस्कृत का खास स्थान है। उन्होंने इस भाषा को आज के समय के हिसाब से प्रासंगिक बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। धामी ने कहा कि संस्कृत सिर्फ़ एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की नींव है। राज्य सरकार इसे आम लोगों तक पहुँचाने और समय के अनुरूप इसे एक नई पहचान दिलाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है।
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संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने कहा कि उत्तराखंड ने 2010 में संस्कृत को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा देकर एक अहम कदम उठाया था। उन्होंने बताया कि धामी ने दिसंबर 2025 में हरिद्वार में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में संस्कृत आयोग की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। 15 जुलाई को हुई एक बैठक में आयोग बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। अधिकारियों ने बताया कि आयोग से संस्कृत शिक्षा और रिसर्च, पुरानी पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने और उन्हें डिजिटल बनाने, भारतीय ज्ञान परंपराओं और वैदिक व शास्त्रीय अध्ययन के लिए काम करने की उम्मीद है। यह संस्कृत पर आधारित स्किल डेवलपमेंट और रोज़गार के मौकों पर ध्यान देगा। इस पैनल का मकसद प्रशासन और तकनीकी क्षेत्रों में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ाना और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व डिजिटल मीडिया में इस भाषा की संभावनाओं को तलाशना है। आयोग उत्तराखंड और उसके बाहर संस्कृत को बढ़ावा देने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए नीतियां और एक्शन प्लान तैयार करेगा।
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