मिराज 4000 की कहानी 1976 में शुरू हुई, जब दस्सॉल्ट ने मिराज 2000 (सिंगल-इंजन लाइटवेट मल्टीरोल) के साथ-साथ एक बड़ा, ट्विन-इंजन वर्जन डेवलप करने का फैसला किया. दोनों प्रोजेक्ट एक साथ चले. फ्रेंच डिफेंस मिनिस्ट्री से कोई फंडिंग न मिलने पर दस्सॉल्ट ने इसे पूरी तरह प्राइवेट वेंचर बनाया. अपनी जेब से खर्च किया. इंजन स्नेक्मा (Snecma) M53 मिराज 2000 के स्टॉक से लिए गए.9 मार्च 1979 को मिराज 4000 ने पहली उड़ान भरी. सिर्फ छठी उड़ान में ही मैक 2 स्पीड हासिल कर ली. 50,000 फीट (15,240 मीटर) की ऊंचाई पर मैक 2 पहुंचने में महज 3 मिनट 50 सेकंड लगे – ये परफॉर्मेंस उस समय के F-15 या Su-27 जैसी थी. दो M53 इंजन (प्रत्येक 95 kN आफ्टरबर्नर थ्रस्ट) से थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो 1 से ज्यादा था, मतलब वजन से ज्यादा पावर. फ्यूल कैपेसिटी मिराज 2000 से तीन गुना ज्यादा, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की सुविधा. कंपोजिट मटेरियल्स (कार्बन-कोटेड फिन सहित) से वजन कम किया गया, फ्लाई-बाय-वायर कंट्रोल्स, ग्लास कॉकपिट और कैनार्ड्स जैसे फीचर्स थे. मैक्स स्पीड मैक 2.2-2.3, सर्विस सीलिंग 20,000 मीटर (65,600 फीट). 11 हार्डपॉइंट्स पर भारी पेलोड – एयर-टू-एयर मिसाइल्स से लेकर ग्राउंड अटैक तक.
अमेरिकी एफ-35 इस वक्त दुनिया का सबसे एडवांस फाइटर जेट है.
एफ-35 को देता था टक्कर
ये जेट इतना एडवांस्ड था कि कुछ लोग इसे F-35 जैसी फ्यूचर जेनरेशन को भी चुनौती देने वाला मानते थे – हाई स्पीड, हाई अल्टीट्यूड, बेहतर क्लाइंब रेट और मल्टीरोल फ्लेक्सिबिलिटी में. हालांकि F-35 स्टेल्थ में आगे है, लेकिन मिराज 4000 की रॉ परफॉर्मेंस (स्पीड, मैन्यूवरेबिलिटी, रेंज) कई मामलों में कमाल की थी. सऊदी अरब के किंग और ईरान के शाह ने पहली उड़ान से पहले ही इंटरेस्ट दिखाया. भारत भी काफी सीरियस था – IAF और डिफेंस मिनिस्ट्री के अधिकारी ने इसे चेक किया, मिराज 2000 के साथ कम्पैटिबिलिटी देखकर संतुष्ट हुए, लेकिन कोई ऑर्डर नहीं आया.
फ्रांस ने छोटे, सस्ते मिराज 2000 को प्राथमिकता दी. एक्सपोर्ट मार्केट में हैवी ट्विन-इंजन फाइटर की डिमांड कम थी. सऊदी ने F-15 लिया, ईरान में रेवोल्यूशन हो गया. भारत ने मिग-29 और ज्यादा मिराज 2000 चुने. पांच प्रोडक्शन मॉडल प्लान थे, लेकिन 1988 में प्रोजेक्ट कैंसल हो गया. प्रोटोटाइप ने 336 फ्लाइट्स किए, आज पेरिस एयर एंड स्पेस म्यूजियम में रखा है. इस फेलियर ने दस्सॉल्ट को बड़ा सबक दिया. मिराज 4000 की टेक्नोलॉजीज – कंपोजिट्स, कैनार्ड्स, एवियोनिक्स, हाई परफॉर्मेंस – बाद में राफेल में इस्तेमाल हुईं. राफेल को मिराज 4000 का छोटा, बेहतर, अफोर्डेबल वर्जन कहा जा सकता है. अगर मिराज 4000 सफल होता, तो शायद राफेल कभी न बनता. लेकिन मार्केट, पॉलिटिक्स और बजट ने इसे उड़ने नहीं दिया. आज राफेल की दुनिया भर में डिमांड देखकर लगता है कि मिराज 4000 की आत्मा जिंदा है – बस नाम और बॉडी बदल गई. ये एविएशन हिस्ट्री का दुखद लेकिन इंस्पायरिंग चैप्टर है: जहां टेक्नोलॉजी आगे थी, मगर किस्मत पीछे रह गई.
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