गिरते रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा बाजार में अपना हस्तक्षेप काफी बढ़ा दिया। बाजार से जुड़े छह बैंकरों के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने कम से कम 8 अरब डॉलर की बिक्री की है। कुछ बैंकरों का अनुमान है कि यह राशि 15 अरब डॉलर तक हो सकती है। इस हस्तक्षेप के बीच 3 सितंबर को रुपया 94.2850 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया, जो दो महीने से अधिक समय का सबसे मजबूत स्तर था।
मौजूद जानकारी के अनुसार, रिजर्व बैंक को हाल के दिनों में डॉलर की बड़ी आवक से रुपये को सहारा देने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिली है। सरकारी कंपनियों और बैंकों के विदेश से लिए जाने वाले कर्ज के लिए केंद्रीय बैंक की सस्ती जोखिम-रक्षा सुविधा तथा बैंकों को विदेशों से डॉलर जमा जुटाने के लिए बिना शुल्क वाली सुविधा के कारण 136 अरब डॉलर से अधिक की राशि देश में आई है।
बैंकों से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इन विदेशी पूंजी प्रवाह ने रिजर्व बैंक को बाजार में बड़ी मात्रा में डॉलर बेचने की सुविधा दी। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने वास्तव में कितने डॉलर बेचे, इसको लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। एक बैंकर ने पिछले सप्ताह की बिक्री करीब 15 अरब डॉलर बताई, जबकि सरकारी बैंक से जुड़े एक अन्य अधिकारी के अनुसार यह राशि 10 से 11 अरब डॉलर के आसपास रही। यह पिछले सप्ताह की तुलना में कम से कम तीन गुना ज्यादा है।
इन बैंकरों ने पहचान सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर जानकारी दी है, क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं है। रिजर्व बैंक ने इस मामले पर भेजे गए सवाल का तत्काल जवाब नहीं दिया।
गौरतलब है कि जब रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर बेचता है तो इसके बदले रुपये बैंकिंग व्यवस्था में वापस आ जाते हैं और उपलब्ध रुपये की मात्रा घटती है। हाल के दिनों में बैंकों के पास अतिरिक्त रुपये की मात्रा रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। जरूरत से ज्यादा नकदी रहने पर बैंकों के बीच अल्पकालिक कर्ज की दर केंद्रीय बैंक की तय दर से नीचे जा सकती है, जिससे मौद्रिक नीति का असर कमजोर पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के पास फिलहाल विदेशी मुद्रा का मजबूत भंडार है। 21 अगस्त तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 740.8 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि इसके बाद यह आंकड़ा 750 अरब डॉलर से भी ऊपर निकल गया होगा। ऐसे मजबूत भंडार से केंद्रीय बैंक को रुपये में अचानक कमजोरी आने पर बाजार में हस्तक्षेप करने की अतिरिक्त क्षमता मिलती है।
हालांकि, रुपये की मौजूदा मजबूती को लंबी अवधि में लगातार बढ़त की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। मई में रुपया 96.96 प्रति डॉलर के निचले स्तर तक चला गया था। इसके बाद इसमें सुधार आया है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि आगे यह सीमित दायरे में रह सकता है।
गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, देश की बाहरी आर्थिक स्थिति में सुधार के बावजूद रुपये में लंबे समय तक तेज मजबूती की संभावना कम है। आयातकों ने रुपये में और गिरावट की आशंका के कारण डॉलर की भविष्य की खरीद बढ़ाई है, जबकि निर्यातक बेहतर भाव मिलने की उम्मीद में डॉलर बेचने से बच रहे हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, रिजर्व बैंक भविष्य में आने वाले डॉलर का इस्तेमाल अपनी वायदा विदेशी मुद्रा देनदारियों को कम करने के लिए कर सकता है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि ये देनदारियां 200 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुकी हैं। ऐसे में आने वाले समय में रिजर्व बैंक के सामने रुपये को स्थिर रखने के साथ विदेशी मुद्रा भंडार और नकदी व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी रहने वाली हैं।
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