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घाना के कलाकार इन्हें केवल पोस्टर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत और एक खत्म होती परंपरा को बचाने का माध्यम भी मानते हैं।
पश्चिमी अफ्रीकी देश घाना में 1980-90 के दशक में वीडियो क्लब दर्शकों को आकर्षित करने के लिए हाथों से बड़े-बड़े पोस्टर बनवाते थे। कलाकार पुरानी आटे की बोरियों पर ऑयल पेंट से पोस्टर बनाते थे।
दिलचस्प बात यह थी कि इनमें अक्सर फिल्म के असली दृश्य नहीं होते थे। पोस्टर बनाने वाले कलाकारों ने चूंकि वह फिल्म खुद नहीं देखी होती थी इसलिए अपनी कल्पना से ऐसे राक्षस, खून-खराबा, विस्फोट या डरावने किरदार जोड़ देते थे, जो फिल्म में कभी दिखाई ही नहीं देते थे।
आज यही पोस्टर दुर्लभ लोक-कला माने जाते हैं। दुनियाभर के संग्रहालय और आर्ट कलेक्टर इन्हें हजारों रुपए में खरीद रहे हैं। ऑनलाइन नीलामी और एग्जीबिशन में इनकी कीमत 50-60 हजार रुपए से शुरू होती है।
इन पोस्टरों की सबसे ज्यादा मांग अमेरिका से आती है। घाना के कलाकार इन्हें केवल पोस्टर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत और एक खत्म होती परंपरा को बचाने का माध्यम भी मानते हैं।
ऑनलाइन डिमांड बढ़ रही
घर-घर टीवी और वीसीआर आने से वीडियो क्लब बंद होने लगे। इससे पोस्टर बनाने की कला भी सिमट गई और कई कलाकार दूसरे कामों में चले गए।
21वीं सदी की शुरुआत में यह काम कुछ समय सुस्त पड़ा, लेकिन ऑनलाइन मार्केटिंग ने इसे फिर से दुनिया भर के फिल्म प्रेमियों तक पहुंचा दिया। अब ये पोस्टर कलेक्टर्स के बीच खास पहचान बना चुके हैं।
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