बिहार के रोहतास जिले के बंजारी गांव के 19 वर्षीय पीयूष राज ने संघर्ष से सफलता की नई मिसाल पेश की है। पीयूष ने हांगकांग में आयोजित एशियन जूनियर चैम्पियनशिप की 4×400 मीटर रिले रेस में ब्रॉन्ज मेडल जीता है। इसके साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एथलेटिक्स मेडल जीतने वाले बिहार के पहले एथलीट बन गए हैं। पीयूष का सफर मुश्किलों भरा रहा है। नक्सल प्रभावित इलाके से आने वाले पीयूष जब महज 9 साल के थे, तब एक सड़क हादसे में उनके पिता का निधन हो गया था। परिवार चलाने के लिए पीयूष और उनके भाई ने घर में ही आटा चक्की चलाई। 15 साल की उम्र में आंखों में बड़ा सपना लिए पीयूष राजधानी पटना पहुंचे। उनके पास सिर्फ 3000 रुपए थे, जो जल्द ही खत्म हो गए। पैसे न होने पर उन्होंने बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के तत्कालीन अधिकारी रवींद्रन शंकरण से मदद मांगी। काम के बदले पीयूष को पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के हॉस्टल की कैंटीन में नौकरी मिल गई। पीयूष बताते हैं, ‘मैं सुबह 5 से 8 बजे तक ट्रेनिंग करता था। फिर दोपहर 3 बजे तक कैंटीन में बर्तन धोता, पोंछा लगाता और खिलाड़ियों को खाना परोसता था। शाम को फिर ट्रेनिंग करता और रात 9 बजे तक वापस कैंटीन का काम संभालता।’ सेना की तैयारी करने वाले लड़कों के साथ दौड़ने वाले पीयूष को फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ देखकर असली प्रेरणा मिली। उनका शारीरिक बदलाव भी हैरान करने वाला था। शुरुआत में पीयूष महज 5 फीट 3 इंच और 53 किलो के दुबले-पतले लड़के थे। लेकिन उन्होंने खुद को 5 फीट 9 इंच के मजबूत धावक में ढाल लिया। हांगकांग का सफर आसान नहीं था। पहले वीजा की समस्या के कारण उन्हें एयरपोर्ट से लौटा दिया गया। अपनी व्यक्तिगत रेस से कुछ ही घंटे पहले वह वहां पहुंचे और थकान के कारण बाहर हो गए। मिक्स्ड रिले में डिस्क्वालिफाई होने पर वह बेहोश तक हो गए थे। लेकिन आखिरी दिन 4×400 मीटर मेंस रिले में पीयूष ने अपना जलवा बिखेरा। उन्होंने रेस के पहले लेग में 45.9 सेकंड का शानदार समय निकाला और टीम को ब्रॉन्ज मेडल जिताकर नया जूनियर नेशनल रिकॉर्ड बना दिया। स्टेडियम में गूंजा ‘एक बिहारी सौ पे भारी’ पीयूष याद करते हुए कहते हैं, ‘स्टेडियम में बिहार के कई लोग मौजूद थे। जब उन्हें पता चला कि मैं भारत के लिए दौड़ रहा हूं, तो वे जोर-जोर से ‘एक बिहारी सौ पे भारी’ के नारे लगाने लगे। यह मेरे लिए एक बहुत ही भावुक और खास पल था।’ अब पीयूष का अगला लक्ष्य इस साल व्यक्तिगत रेस में 46 सेकंड से कम समय निकालना है। वे जल्द ही तिरुवनंतपुरम में राष्ट्रीय शिविर का हिस्सा बनेंगे। वे कहते हैं, ‘अब मुझे पीछे नहीं देखना है, बस आगे ही आगे जाना है।’
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