हम आपको बता दें कि नेपाली संसद में बोलते हुए बालेन्द्र शाह ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है। उन्होंने दोनों देशों से तथ्यों का अध्ययन कर मित्रवत तरीके से विवाद सुलझाने की अपील की। उधर, नेपाल में विपक्षी दलों और पूर्व राजनयिकों ने बालेन्द्र शाह की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नेपाली कांग्रेस की बसना थापा और अन्य नेताओं ने संसद के अभिलेखों से बयान हटाने की मांग की। पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी प्रधानमंत्री से माफी मांगने की बात कही। नेपाल के पूर्व राजदूत नीलाम्बर आचार्य और दीप कुमार उपाध्याय ने स्पष्ट कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर अतिक्रमण का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। सीमा विशेषज्ञ बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने भी प्रधानमंत्री की बातों को तथ्यात्मक आधार से रहित बताया। इस प्रकार बालेन्द्र शाह का बयान भारत से अधिक नेपाल के भीतर ही विवाद का विषय बन गया।
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दरअसल, सीमा विवाद का केंद्र लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र हैं। नेपाल का दावा है कि सुगौली संधि के अनुसार काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए उसके पूर्व का पूरा क्षेत्र नेपाली भूभाग है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम लिपुलेख दर्रे के नीचे स्थित स्रोतों से होता है और ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कालापानी क्षेत्र लंबे समय से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा रहा है। यही मूल विवाद दोनों देशों के दावों की जड़ में है।
हम आपको बता दें कि विवाद को हाल में उस समय नया मोड़ मिला जब नेपाल ने लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक नोट भेजा। भारत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा 1954 से लगातार संचालित हो रही है और यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है। भारत ने यह भी दोहराया कि एकतरफा तरीके से क्षेत्रीय दावों का विस्तार न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही स्वीकार्य है।
उधर, बालेन्द्र शाह के बयान पर विवाद खड़ा होने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था कि नेपाल ने आधिकारिक रूप से भारतीय भूमि पर कब्जा किया है। मंत्रालय के अनुसार सीमा के कुछ हिस्सों में सीमा स्तंभों की कमी, दशगजा क्षेत्र और सीमापार भूमि उपयोग जैसी व्यावहारिक समस्याओं के कारण ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं जहां दोनों ओर के लोग एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि दोनों देश कूटनीतिक बातचीत, तकनीकी सर्वेक्षण और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
लेकिन सबसे अधिक हैरानी प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के उस सुझाव पर हुई जिसमें उन्होंने सीमा विवाद के समाधान में ब्रिटेन की भागीदारी की बात उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान सीमाओं की पृष्ठभूमि औपनिवेशिक काल से जुड़ी है, इसलिए ब्रिटेन को भी इस विषय में रुचि लेनी चाहिए। यह प्रस्ताव न केवल व्यावहारिक दृष्टि से कमजोर माना गया बल्कि नेपाल के भीतर भी इसे अपरिपक्व और अनावश्यक बताया गया। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद हमेशा द्विपक्षीय ढांचे में चर्चा का विषय रहा है। ऐसे में तीसरे पक्ष को बीच में लाने की बात कूटनीतिक परंपराओं और स्थापित समझ से मेल नहीं खाती।
इसके अलावा, सीमा विवाद जैसे संवेदनशील और पूर्णतः द्विपक्षीय विषय में ब्रिटेन को शामिल करने का सुझाव बालेन्द्र शाह की कूटनीतिक नासमझी का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन था जिसने कई जानकारों को हैरान कर दिया। भारत दशकों से स्पष्ट करता आया है कि वह अपने किसी भी द्विपक्षीय विवाद में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या दखल को स्वीकार नहीं करता, चाहे मामला पाकिस्तान का हो, चीन का हो या नेपाल का। ऐसे में ब्रिटेन को बातचीत की मेज पर बुलाने का प्रस्ताव शुरू से ही अव्यावहारिक और वास्तविकताओं से कटा हुआ नजर आया। जिस देश ने दो शताब्दियों पहले उपमहाद्वीप छोड़ दिया, उसे आज की सीमा वार्ताओं में घसीटने की कोशिश को कई पर्यवेक्षकों ने राजनीतिक अपरिपक्वता बताया। दिलचस्प यह है कि बालेन्द्र शाह की इस टिप्पणी पर केवल नेपाल में ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के रणनीतिक और दक्षिण एशियाई मामलों पर नजर रखने वाले हलकों में भी हैरानी जताई गई और इसे अव्यावहारिक सोच का उदाहरण माना गया। कूटनीति की दुनिया में जहां गंभीरता, तैयारी और यथार्थवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है, वहां बालेन्द्र शाह का यह सुझाव कई लोगों को ऐसा लगा मानो किसी जटिल अंतरराष्ट्रीय विवाद के समाधान के लिए इतिहास की धूल झाड़कर ऐसे पात्रों को मंच पर बुलाने की कोशिश की जा रही हो जिनकी अब उस प्रक्रिया में कोई वास्तविक भूमिका ही नहीं बची है।
देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से लिपुलेख क्षेत्र का महत्व अत्यंत गहरा है। यह भारत, नेपाल और चीन के त्रिसीमा क्षेत्र के निकट स्थित है। यह केवल धार्मिक यात्रा का मार्ग नहीं बल्कि हिमालयी क्षेत्र में संपर्क, निगरानी और रणनीतिक पहुंच का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। चीन की बढ़ती सक्रियता और हिमालयी क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और भी संवेदनशील हो गया है। इसलिए इस क्षेत्र से जुड़ा कोई भी राजनीतिक बयान केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसके व्यापक सामरिक प्रभाव भी होते हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री का बयान इसी कारण अधिक विवादास्पद बन गया। बिना पर्याप्त तैयारी और तथ्यों की मजबूत प्रस्तुति के ऐसे संवेदनशील विषयों पर टिप्पणी करना न केवल कूटनीतिक भ्रम पैदा करता है बल्कि अपने ही देश की आधिकारिक स्थिति को कमजोर भी कर सकता है। यही कारण है कि उनकी टिप्पणियों के तुरंत बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को स्पष्टीकरण देना पड़ा और देश के अनेक राजनीतिक तथा कूटनीतिक विशेषज्ञों ने उनकी आलोचना की।
बहरहाल, यह पूरा प्रकरण एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े मतभेद अवश्य हैं, लेकिन दोनों देशों ने बार-बार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से समाधान की प्रतिबद्धता जताई है। ऐसे समय में भावनात्मक या बचकाने राजनीतिक बयान समाधान का रास्ता नहीं खोलते, बल्कि अनावश्यक भ्रम और विवाद को जन्म देते हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की हालिया टिप्पणियां इसी का उदाहरण बन गई हैं, जहां भारत पर निशाना साधने की कोशिश से अधिक नुकसान उन्हें अपने ही देश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में उठाना पड़ा है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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