पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण विमान ईंधन महंगा हो गया था, जिसका सीधा असर हवाई किरायों पर पड़ा। हालांकि अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है और ऐसे में यात्रियों के लिए राहत की उम्मीद भी बढ़ने लगी है।
बता दें कि केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू ने संकेत दिए हैं कि यदि विमान ईंधन की कीमतों में मौजूदा गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है तो सरकार विमान कंपनियों से अतिरिक्त शुल्क और बढ़े हुए किरायों की समीक्षा करने को कह सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार विमान ईंधन की कीमतों पर नजर रख रही है और इस विषय पर विमान कंपनियों के साथ बातचीत भी जारी है।
मौजूद जानकारी के अनुसार हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थीं। इसके चलते विमान टरबाइन ईंधन की लागत में भी भारी बढ़ोतरी हुई थी। ईंधन लागत बढ़ने के बाद कई विमान कंपनियों ने अतिरिक्त शुल्क जोड़कर यात्रियों पर बढ़े हुए खर्च का बोझ डाला था। अब जबकि कच्चे तेल की कीमतें युद्ध पूर्व स्तरों के करीब पहुंच रही हैं, सरकार यह आकलन कर रही है कि इसका लाभ यात्रियों तक किस प्रकार पहुंचाया जा सकता है।
गौरतलब है कि विमान टरबाइन ईंधन की कीमतों की समीक्षा हर पंद्रह दिन में की जाती है। यह समीक्षा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर होती है। मंत्री ने कहा कि अभी यह देखना जरूरी है कि कीमतों में आई गिरावट स्थायी है या केवल अस्थायी बदलाव है। यदि कीमतों में स्थिरता बनी रहती है, तभी किराए और अतिरिक्त शुल्कों में कटौती पर गंभीर चर्चा की जाएगी।
के. राम मोहन नायडू ने कहा कि पिछले चार महीने विमानन क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। इस दौरान ईंधन लागत और वैश्विक परिस्थितियों ने उद्योग पर काफी दबाव डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार और विमान कंपनियां मिलकर स्थिति का मूल्यांकन कर रही हैं और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होने के बाद यात्रियों को राहत देने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
बता दें कि विमानन क्षेत्र को सहारा देने के लिए सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये का मूल्य स्थिरीकरण कोष भी बनाया है। इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया संकट जैसी परिस्थितियों में विमान कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इसके अलावा सरकार ने घरेलू अनुसूचित विमान सेवाओं के लिए विमान ईंधन की कीमतों पर सीमा निर्धारित करने, हवाई अड्डा शुल्कों में कमी करने और आपातकालीन ऋण सहायता योजना के तहत समर्थन देने जैसे कदम भी उठाए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में कच्चे तेल और विमान ईंधन की कीमतें नियंत्रित रहती हैं तो विमान कंपनियों पर लागत का दबाव कम होगा। ऐसे में अतिरिक्त शुल्कों में कटौती और टिकट कीमतों में कमी की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि अंतिम फैसला बाजार की परिस्थितियों और ईंधन कीमतों की दीर्घकालिक दिशा पर निर्भर करेगा। फिलहाल यात्रियों और विमानन क्षेत्र दोनों की नजर सरकार और विमान कंपनियों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
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