यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है। यह शहर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर है। बाब अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। मोखा पर पहले यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स का नियंत्रण था। यह हूतियों के खिलाफ लड़ने वाला सऊदी समर्थित गुट है। दोनों के बीच पिछले 9 दिनों से लड़ाई चल रही थी। मोखा पर कब्जे के बाद पिछले 4 साल में यह हूतियों की सबसे बड़ी क्षेत्रीय कामयाबी मानी जा रही है। अब हूती लड़ाके यमन के अहम शहर ताइज की ओर बढ़ रहे हैं। इस बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को संदेश भेजकर हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए कहने को कहा है। हालांकि, एक ईरानी अधिकारी ने कहा है कि ईरान हूतियों को कंट्रोल नहीं करता। अब मैप से समझिए, यमन के किन इलाकों पर किसका कब्जा रहा है… मोखा पर कब्जे से हूतियों की पकड़ मजबूत मोखा लंबे समय से यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स के नियंत्रण में था। पिछले करीब 10 दिनों से हूती लड़ाके ताइज की पश्चिमी दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले अल-शकीरा इलाके पर भी कब्जा कर लिया। यह इलाका ताइज शहर को पश्चिमी तट से जोड़ने वाले अहम रास्ते पर है। इस पर कब्जे से इस इलाके में हूतियों की पकड़ और मजबूत हो गई। हूती पहले से ही यमन की राजधानी सना और लाल सागर के बड़े बंदरगाह होदेइदा पर नियंत्रण रखते हैं। मोखा पर कब्जे से पश्चिमी तट के एक और अहम इलाके पर उनका नियंत्रण हो गया है। यही वजह है कि मोखा की लड़ाई को सिर्फ एक बंदरगाह शहर पर कब्जे के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इससे यमन के पश्चिमी तट पर हूतियों की सैन्य और रणनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है। बाब अल-मंदेब के करीब पहुंचे हूती, जहाजों पर बढ़ा खतरा मोखा पर कब्जे के बाद हूती बाब अल-मंदेब के और करीब पहुंच गए हैं। उन्होंने लाल सागर में मौजूद हनीश द्वीपों की ओर भी बढ़त बनाई है। धुबाब और उसके सामने मौजूद ये द्वीप बाब अल-मंदेब के बहुत करीब हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हूती इस इलाके में अपनी पकड़ और मजबूत करते हैं, तो लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखना और उन पर दबाव बनाना उनके लिए आसान हो सकता है। बाब अल-मंदेब समुद्र का एक संकरा रास्ता है। यहां से गुजरने वाले जहाजों को खतरा पैदा करने के लिए किसी बहुत बड़े इलाके पर कब्जा करना जरूरी नहीं है। यानी आसपास के कुछ रणनीतिक इलाकों पर पकड़ बनाकर भी हूती जहाजों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान बोला- सऊदी की मदद के लिए सेना नहीं भेजेंगे हूती विद्रोहियों को ईरान जबकि यमन सरकार को सऊदी अरब समर्थन दे रहे हैं। यमन में हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने फिलहाल सैन्य कार्रवाई से इनकार किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत अभी हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। उन्होंने कहा, अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है। जब समय आएगा, तब समझौते के तहत कार्रवाई की जाएगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का यह बयान रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक दिन पहले दिए बयान के बाद आया है। आसिफ ने कहा था कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक पहुंचता है, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ रक्षा समझौता लागू हो सकता है। 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए रक्षा समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला होने पर बाकी दोनों देश उसकी सुरक्षा में मदद करेंगे। यमन में फिर क्यों तेज हुई लड़ाई यमन में हूतियों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के बीच गृहयुद्ध 2014 में शुरू हुआ था। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों से दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम हुआ। हालांकि लेकिन दोनों के बीच कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो सका। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईरान के अमेरिका के साथ चल रहे संघर्ष में उलझे होने का असर यमन पर भी पड़ रहा है। ऐसे में यमन सरकार हूतियों के कब्जे वाले इलाकों को वापस लेना चाहती है। वहीं, हूती लाल सागर के किनारे और बाब अल-मंदेब के आसपास अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहते हैं। यही वजह है कि अब मोखा, ताइज और होदेइदा के आसपास लड़ाई तेज हो गई है। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के कई लड़ाके और आम लोग मारे गए हैं। हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा है। सऊदी ने 2015 में हूती के खिलाफ जंग शुरू की हादी के पद छोड़ने के बाद से यमन पर किसी एक सरकार का कंट्रोल नहीं रह गया। इससे पड़ोस के सऊदी अरब को खतरा महसूस हुआ क्योंकि हूती का समर्थन ईरान कर रहा था। ऐसे में सऊदी ने 2015 में आठ अरब देशों के साथ मिलकर सैन्य गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग शुरू कर दी। इस गठबंधन का मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर सत्ता में लाना था। करीब आठ साल तक लड़ाई के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूतियों को हराना संभव नहीं है। इसके बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से संपर्क शुरू किया। आज उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। वहीं दक्षिणी यमन अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। खबर अपडेट हो रही है…
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