बचपन से ही हर्षिता का लक्ष्य साफ था कि वह केवल किताबों से पढ़ना नहीं, बल्कि नई तकनीक विकसित करना और उपयोगी प्रोडक्ट बनाना चाहती थीं। स्कूल छोड़ने के बाद उन्होंने सेल्फ-लर्निंग का रास्ता चुना।
16 साल की उम्र में बनाया ऐप
बचपन से ही हर्षिता का लक्ष्य साफ था कि वह केवल किताबों से पढ़ना नहीं, बल्कि नई तकनीक विकसित करना और उपयोगी प्रोडक्ट बनाना चाहती थीं। स्कूल छोड़ने के बाद उन्होंने सेल्फ-लर्निंग का रास्ता चुना। बिना किसी कोचिंग या क्लासरूम के, केवल कंप्यूटर और इंटरनेट की मदद से उन्होंने खुद प्रोग्रामिंग सीखी। अपनी मेहनत और लगन के दम पर महज 16 साल की उम्र में उन्होंने क्रिप्टो पोर्टफोलियो ट्रैकिंग ऐप विकसित की। यह ऐप इस्तेमाल में आसान थी और यूजर्स की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। यह बात थी साल 2016 की।
एप्पल ने ऐप को किया फीचर
हर्षिता की इस उपलब्धि पर दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Apple की भी नजर पड़ी। Apple ने उनके ऐप को फीचर किया, जिसके बाद यह अमेरिका और कनाडा में फाइनेंस कैटेगरी की सबसे लोकप्रिय ऐप्स में दूसरे स्थान तक पहुंच गई। बाद में इस ऐप का अधिग्रहण भी कर लिया गया।
पीएम मोदी ने किया था सम्मानित
हर्षिता की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने भी उन्हें सम्मानित किया। साल 2020 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी दौरान उन्होंने अमेरिका जाने के लिए O-1 वीजा के लिए आवेदन किया। यह वीजा केवल उन लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हों। इस वीजा के लिए उन्हें 10 कंपनियों के CEO की सिफारिश की जरूरत थी, लेकिन उनकी प्रतिभा को देखते हुए 15 CEOs ने उनके समर्थन में सिफारिश दी।
इसके बाद हर्षिता अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को पहुंचीं और साल 2019 में विग्नन वेलिवेला और तुषार मिश्रा के साथ मिलकर AtoB नाम का स्टार्टअप शुरू किया। उनका आइडिया इतना दमदार था कि स्टार्टअप को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित स्टार्टअप एक्सेलरेटर Y Combinator के Summer 2020 Batch में भी जगह मिली। यहीं से हर्षिता के वैश्विक उद्यमी बनने के सफर ने नई उड़ान भरी।
महामारी ने बदल दी दिशा, लेकिन नहीं टूटा हौसला
जब हर्षिता अरोड़ा और उनकी टीम अपने स्टार्टअप पर तेजी से काम कर रही थी, तभी पूरी दुनिया में कोविड-19 महामारी फैल गई। महामारी के कारण उनका शुरुआती बिजनेस आइडिया लॉन्च होने से पहले ही बेकार साबित हो गया। जिस प्रोडक्ट पर उन्होंने महीनों मेहनत की थी, बदलती परिस्थितियों में उसकी जरूरत ही खत्म हो गई। उस दौर में कई स्टार्टअप बंद हो गए और कई फाउंडर्स ने अपने सपनों को छोड़कर दोबारा नौकरी का रास्ता चुन लिया।
लेकिन हर्षिता और उनकी टीम ने हार मानने के बजाय नया रास्ता तलाशा। उन्होंने अमेरिका के अलग-अलग ट्रक स्टॉप्स पर जाकर कई हफ्तों तक ट्रक ड्राइवरों और फ्लीट ऑपरेटर्स से बातचीत की। वे उनसे उनके रोजमर्रा के काम, भुगतान से जुड़ी समस्याओं और दूसरी चुनौतियों के बारे में लगातार सवाल पूछते रहे। शुरुआत में उन्हें ट्रकिंग इंडस्ट्री या फ्लीट पेमेंट सिस्टम की कोई खास जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्होंने सीखने का सिलसिला नहीं छोड़ा।
इसी रिसर्च के बाद टीम ने अपने स्टार्टअप की पूरी रणनीति बदलने का फैसला किया। उन्होंने AtoB को नए सिरे से तैयार किया और इस बार अमेरिकी ट्रकिंग इंडस्ट्री के लिए आधुनिक वित्तीय सेवाएं विकसित कीं। कंपनी ने फ्लीट कार्ड, इंस्टेंट पेमेंट और ऐसे कई डिजिटल टूल्स बनाए, जिनसे वर्षों से पुराने तरीकों पर निर्भर ट्रकिंग सेक्टर को आधुनिक समाधान मिले।
खड़ी कर दी 7600 करोड़ क कंपनी
मनी कंट्रोल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक आज AtoB अमेरिका की 30000 से अधिक ट्रकिंग फ्लीट्स को अपनी सेवाएं दे रही है। कंपनी की वैल्यूएशन करीब 80 करोड़ डॉलर (लगभग 7,600 करोड़ रुपये) पहुंच चुकी है, जो इसकी बड़ी सफलता को दर्शाती है।
हर्षिता की कहानी सिर्फ एक सफल स्टार्टअप या बड़ी वैल्यूएशन की नहीं है। यह उस जज्बे की कहानी है, जिसमें एक छोटे शहर की स्कूल छोड़ने वाली किशोरी ने उस इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई, जिसके बारे में शुरुआत में उसे कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने न अपनी कमियों को रुकावट बनने दिया और न ही पहली असफलता को अपनी मंजिल का अंत माना। लगातार सीखने, खुद को बदलने और आगे बढ़ते रहने की यही सोच उन्हें आज दुनिया के सफल युवा उद्यमियों में शामिल करती है।
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