(जेन एडकिन्स, डबलिन सिटी यूनिवर्सिटी)
डबलिन (आयरलैंड), 28 जुलाई (द कन्वरसेशन) आज तक जिन भी प्राचीन भाषाओं को पढ़ा और समझा जा सका है, उनके रहस्य सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं को किसी न किसी आधार का सहारा मिला है। आमतौर पर यह आधार कोई द्विभाषी अभिलेख होता है, जैसे रोसेटा स्टोन, या फिर उससे मिलती-जुलती कोई ज्ञात भाषा, जिससे तुलना की जा सके, लेकिन कांस्य युग में यूनान के क्रीट द्वीप पर विकसित मिनोअन सभ्यता की लिपि ‘लीनियर ए’ के साथ ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
‘लीनियर ए’ को भाषाविज्ञान में ‘असंबद्ध भाषा’ माना जाता है, क्योंकि इसका किसी ज्ञात जीवित या विलुप्त से अबतक कोई प्रमाणित संबंध स्थापित नहीं हो सका है। यही कारण है कि पिछले एक शताब्दी से यह भाषाविदों के लिए सबसे कठिन पहेलियों में से एक बनी हुई है।
इसी तरह रोमन साम्राज्य के उदय से पहले प्रचलित रही इटली की ‘एट्रस्कन’ को समझने में भी केवल सीमित सफलता मिली है। कब्रों पर मिले छोटे-छोटे अभिलेखों के आधार पर इसका कुछ शब्दकोश तैयार किया जा सका है, लेकिन इसकी व्याकरण और गहरे अर्थ अब भी भाषाविदों की पकड़ से बाहर हैं।
यही वे भाषाएं हैं, जिनकी पहेली सुलझाने में अब कृत्रिम मेधा (एआई) को भी शामिल किया जा रहा है। हालांकि एआई भाषाविदों की जगह नहीं ले रहा, बल्कि उनके अनुमानों की जांच को कहीं अधिक तेज और व्यापक बना रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एआई वह कर पाएगा, जो एक सदी के मानवीय प्रयासों के बावजूद अबतक संभव नहीं हो सका?
हाल का एक उदाहरण इस संभावना और उसकी सीमाओं, दोनों को सामने लाता है। जून 2026 में कृत्रिम मेधा के जानकार और शौकिया भाषाविद ने दावा किया कि उसने ‘लीनियर ए’ को समझने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। इसकी शुरुआत उसने एक अनुमान से की कि एक प्रार्थना संबंधी अभिलेख में प्रयुक्त एक अज्ञात शब्द किसी सामी की उस मूल धातु से निकला हो सकता है, जिसका अर्थ ‘‘बसना’’ या ‘‘निवास करना’’ होता है।
इसके बाद उसने कृत्रिम मेधा से तैयार प्रोग्रामिंग स्क्रिप्ट की मदद से इस ध्वनि-पैटर्न की तुलना ‘लीनियर ए’ के उपलब्ध समूचे अभिलेख-संग्रह से की। उसके अनुसार, वह 40 संकेतों का ध्वनि-रूप निर्धारित करने और 408 शब्दों का एक कोश तैयार करने में सफल रहा। उसके दावे के मुताबिक, ‘लीनियर ए’ वास्तव में सामी परिवार की एक विलुप्त है, जिसमें हिब्रू और अरामाइक जैसी भाषाएं शामिल हैं।
रचनात्मक सोच की जरूरत
यह समझना जरूरी है कि इस मामले में कृत्रिम मेधा ने क्या किया और क्या नहीं किया। मूल विचार एआई का नहीं, बल्कि उस तकनीकी जानकार का था।
एआई ने केवल एक शोध सहायक की भूमिका निभाई। उसने मानवीय अनुमान के हजारों संकेतों के साथ बहुत तेजी से तुलना कर उसकी जांच की। यही काम यदि कोई व्यक्ति हाथ से करता, तो उसे महीनों लग सकते थे। फिलहाल कृत्रिम मेधा और मनुष्य के बीच यही कार्य-विभाजन सबसे महत्वपूर्ण है, न कि कोई ऐसा दावा जिसकी अब भी विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जा रही है।
तो आखिर एआई कहां सबसे अधिक उपयोगी साबित होता है और कहां उसकी सीमाएं सामने आ जाती हैं? बड़े पैमाने पर पैटर्न की जांच करने में उसकी क्षमता असाधारण है। किसी संकेत या शब्द के बारे में लगाए गए अनुमान की वह पूरे अभिलेख-संग्रह में कुछ ही मिनटों में जांच कर सकता है, जिसमें मनुष्य को वर्षों लग सकते हैं। वह ऐसे दोहराए जाने वाले क्रम भी पहचान सकता है, जो सामान्यतः मानवीय नजर से छूट जाते हैं। इतना ही नहीं, वह क्षतिग्रस्त या अधूरे अभिलेखों में संभावित लुप्त संकेतों का अनुमान लगाकर उन्हें पुनर्निर्मित करने में भी मदद कर सकता है।
कृत्रिम मेधा की एक और विशेष क्षमता ‘अंतर-भाषीय अंतरण’ है। इसमें किसी ज्ञात पर प्रशिक्षित मॉडल कभी-कभी उससे निकट संबंध रखने वाली किसी अज्ञात के पैटर्न का भी अनुमान लगा सकता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यदि आपको स्पेनिश आती है, तो पुर्तगाली के कुछ शब्द और संरचनाएं सहज ही समझ में आने लगती हैं।
शोधकर्ता इस पद्धति का सफल उपयोग उगारिटिक जैसी लिपियों पर कर चुके हैं, जहां भाषा-परिवार पहले से ज्ञात है। उगारिटिक एक विलुप्त सामी थी, जो कांस्य युग के अंत (लगभग 1300-1190 ईसा पूर्व) में प्राचीन तटीय नगर उगारिट (वर्तमान सीरिया) में बोली जाती थी।
लेकिन यहां एक बड़ी रुकावट भी है। केवल सांख्यिकीय पैटर्न की पहचान के आधार पर किसी का अर्थ नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए किसी ज्ञात या द्विभाषी अभिलेख जैसे ठोस आधार की आवश्यकता होती है, जिससे यह तय किया जा सके कि कौन-सा पैटर्न वास्तव में अर्थपूर्ण है और कौन-सा केवल संयोग।
‘लीनियर ए’ और ‘एट्रस्कन’ को समझना इसलिए इतना कठिन है, क्योंकि ऐसा आधार या तो उपलब्ध नहीं है या अधूरा है। केवल अधिक कंप्यूटिंग क्षमता इस कमी को पूरा नहीं कर सकती।
सीमित साक्ष्य सबसे बड़ी चुनौती
यदि किसी का पर्याप्त बड़ा अभिलेख-संग्रह उपलब्ध हो, तो सैद्धांतिक रूप से कोई एआई मॉडल इतना दक्ष हो सकता है कि वह किसी मिनोअन या एट्रस्कन वक्ता से अपनी सांख्यिकीय समझ के आधार पर बातचीत जैसा व्यवहार कर सके। यानी वह शब्दों और की संरचनाओं में दोहराए जाने वाले क्रमों को पहचानकर उन्हें दूसरे संदर्भ में इस्तेमाल कर सकता है, जिससे सतही स्तर पर सीमित संवाद संभव प्रतीत हो सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह मनुष्यों को उस का सही अनुवाद दे सकेगा। यहां में दक्षता और अर्थ की समझ, दो अलग-अलग बातें हैं। मॉडल यह तो सीख सकता है कि कौन-सा संकेत किसके बाद आता है और कौन-से शब्द अक्सर साथ दिखाई देते हैं, लेकिन वह यह नहीं जान सकता कि वे वास्तव में किस वस्तु, व्यक्ति या विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसी कारण इन भाषाओं से जुड़े कृत्रिम मेधा आधारित किसी भी दावे की पुष्टि करना अत्यंत कठिन है। सामान्यतः किसी प्रस्तावित अनुवाद या व्याख्या की जांच उस के वक्ताओं, अन्य उपलब्ध ग्रंथों या दशकों से विकसित विशेषज्ञों की सहमति के आधार पर की जाती है। लेकिन जिन भाषाओं को अब तक पढ़ा ही नहीं जा सका है, उनके मामले में ऐसा कोई आधार मौजूद नहीं है। समय-यंत्र के बिना इसकी पुष्टि का कोई तरीका नहीं है।
समस्या इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि ‘लीनियर ए’ का पूरा उपलब्ध अभिलेख-संग्रह केवल लगभग 7,500 संकेतों का है। यह इतना छोटा है कि एक स्क्रीन पर समा सकता है। इतने सीमित आंकड़ों में लगभग हर परिकल्पना के समर्थन में कुछ न कुछ उदाहरण ढूंढ़ लेना संभव हो जाता है।
यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी नए दावे की विश्वसनीयता का आधार कृत्रिम मेधा द्वारा दिए गए सांख्यिकीय भरोसे का स्तर नहीं, बल्कि स्वतंत्र विशेषज्ञों की गहन जांच और सहकर्मी समीक्षा होती है। इसलिए ‘‘एआई ने कोई पैटर्न खोज लिया’’ और ‘‘एआई ने सही अर्थ खोज लिया’’—ये दोनों बिल्कुल अलग दावे हैं, जिन्हें अक्सर एक ही समझ लिया जाता है।
इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि प्राचीन भाषाओं को समझने में कृत्रिम मेधा उपयोगी नहीं है। इसके विपरीत, यह शोध की गति कई गुना बढ़ा सकती है। वर्षों की तुलना और विश्लेषण की प्रक्रिया अब कुछ ही मिनटों में पूरी हो सकती है और सीमित संसाधनों वाले अधिक लोग भी इस दिशा में शोध कर सकते हैं।
फिर भी, का रहस्य खोलने के लिए आज भी दो चीजें जरूरी हैं। पहली, किसी ज्ञात या द्विभाषी अभिलेख जैसा विश्वसनीय आधार। दूसरी, विशेषज्ञों द्वारा की जाने वाली कठोर मानवीय समीक्षा, ताकि वास्तविक खोज और महज संयोग के बीच अंतर किया जा सके।
जब तक ‘लीनियर ए’ या ‘एट्रस्कन’ के लिए ऐसा कोई आधार उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक प्राचीन भाषाओं को समझने में कृत्रिम मेधा की भूमिका एक तेज, सक्षम और उपयोगी सहायक भर रहेगी।
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