इस युद्ध के परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो सबसे बड़ा लाभार्थी ईरान दिखाई देता है। अमेरिका और इजरायल के सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद तेहरान न केवल अपने राजनीतिक ढांचे को बचाने में सफल रहा, बल्कि उसने अपने विरोधियों को वार्ता की मेज पर आने के लिए भी बाध्य किया। ईरान अब अपने नागरिकों के समक्ष यह दावा कर सकता है कि उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों के सामने घुटने नहीं टेके। ईरानी नेतृत्व इसे प्रतिरोध की जीत के रूप में प्रस्तुत करेगा। दूसरी ओर इस संघर्ष ने अमेरिका की अजेयता की छवि को भी चुनौती दी है। वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान के बाद यह एक और अवसर है, जिसने यह स्पष्ट किया कि केवल सैन्य शक्ति राजनीतिक परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकती। वाशिंगटन ने दबाव बनाया, अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया, लेकिन अंततः उसे वार्ता और समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा। इससे यह संदेश गया है कि इक्कीसवीं सदी की दुनिया अब केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग से संचालित होगी।
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इजरायल के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से असहज है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को अपने देश के अस्तित्व के लिए खतरा बताते रहे हैं। इजरायल को आशा थी कि युद्ध के माध्यम से ईरान की सामरिक क्षमता को निर्णायक रूप से कमजोर किया जाएगा। किंतु युद्धविराम के बाद ईरान स्वयं को विजेता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इससे इजरायल के भीतर यह बहस और तीव्र हो सकती है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं की तुलना में महाशक्तियों ने अपने सामरिक हितों को अधिक महत्व दिया। भारत के लिए यह समझौता विशेष महत्व रखता है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भर है। युद्ध की स्थिति में तेल आपूर्ति बाधित होने, समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट उत्पन्न होने और कीमतों में वृद्धि की आशंका ने भारत की चिंता बढ़ा दी थी। युद्धविराम से तेल कीमतों पर दबाव कम होगा, महंगाई नियंत्रित रहेगी और खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी घटेंगी। लेकिन भारत का महत्व केवल एक उपभोक्ता राष्ट्र के रूप में नहीं है, वह आज वैश्विक शांति के एक नैतिक प्रवक्ता के रूप में भी उभर रहा है।
दरअसल, यह युद्ध एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है-क्या मानव सभ्यता युद्धों के सहारे अपने भविष्य का निर्माण कर सकती है? आज महाशक्तियों ने ऐसी विनाशकारी सैन्य क्षमता अर्जित कर ली है कि किसी भी देश की एक छोटी-सी भूल संपूर्ण मानवता को विनाश की ओर धकेल सकती है। परमाणु हथियारों, जैविक अस्त्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणालियों के युग में युद्ध अब केवल सीमाओं का प्रश्न नहीं रह गया है, वह समूची मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यही कारण है कि आज दुनिया को शक्ति की नहीं, शांति की राजनीति की आवश्यकता है। हिंसा, युद्ध, आतंकवाद और शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्धा ने मानवता को भय, अविश्वास और असुरक्षा के गर्त में धकेल दिया है। यदि विश्व को बचाना है, तो उसे निःशस्त्रीकरण, अहिंसा, सह-अस्तित्व और संवाद की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा।
इस संदर्भ में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है। भारत ने सदैव विश्व को शांति, करुणा और अहिंसा का संदेश दिया है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आंख के बदले आंख पूरे विश्व को अंधा बना देगी।’ आज यह कथन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। भारत की सांस्कृतिक चेतना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत पर आधारित रही है, जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानती है। यही कारण है कि भारत ने सदैव युद्ध के स्थान पर संवाद और टकराव के स्थान पर सहमति का समर्थन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व के अनेक मंचों पर स्पष्ट रूप से कहा है कि ‘यह युग युद्ध का नहीं है।’ संयुक्त राष्ट्र, जी-20, ब्रिक्स तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि वार्ता है। यदि अंततः देशों को बातचीत की मेज पर ही लौटना पड़ता है, तो युद्ध की भयावह कीमत चुकाने की आवश्यकता ही क्या है?
भारत की विदेश नीति आज एक नए स्वरूप में सामने आ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष हो अथवा पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट-भारत ने किसी पक्ष विशेष का अंध समर्थन करने के बजाय संतुलन, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की नीति अपनाई है। यही संतुलित दृष्टिकोण भविष्य में भारत को वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की दिशा में अग्रसर कर सकता है। लेकिन केवल सरकारें ही शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। शांति का आधार समाजों, संस्कृतियों और मनुष्यों के भीतर निर्मित होता है। जब तक राष्ट्रवाद आक्रामकता का रूप लेता रहेगा, जब तक हथियार उद्योग युद्धों को लाभ का साधन बनाकर चलता रहेगा और जब तक राजनीतिक नेतृत्व युद्ध को लोकप्रियता अर्जित करने के उपकरण के रूप में उपयोग करता रहेगा, तब तक स्थायी शांति का सपना अधूरा रहेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व समुदाय कुछ ठोस कदम उठाए-परमाणु एवं सामरिक हथियारों की होड़ को नियंत्रित किया जाए, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाया जाए, अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए स्थायी संवाद तंत्र विकसित किए जाएं और शिक्षा प्रणालियों में शांति एवं अहिंसा के मूल्यों को शामिल किया जाए। साथ ही युद्ध अर्थव्यवस्था के स्थान पर मानव कल्याण आधारित विकास मॉडल को प्राथमिकता दी जाए। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम निश्चय ही राहत का क्षण है, किंतु इसे स्थायी शांति में परिवर्तित करना अभी शेष है। यदि यह केवल सामरिक पुनर्संरचना का चरण बनकर रह गया, तो भविष्य में और भी अधिक विनाशकारी संघर्षों का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। लेकिन यदि विश्व समुदाय इस अवसर को आत्ममंथन का क्षण मानकर अहिंसा, संवाद और सह-अस्तित्व की नई वैश्विक संस्कृति विकसित करता है, तो यह युद्धविराम मानव इतिहास के एक नए अध्याय का प्रारंभ भी बन सकता है। दुनिया को आज युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला चाहिए। मानवता के समक्ष यही सबसे बड़ी चुनौती है और यही सबसे बड़ा अवसर भी।
– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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