पाकिस्तान के बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा ने अमेरिका-पाकिस्तान के रेको डिक माइनिंग प्रोजेक्ट को संकट में डाल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी वैल्यू करीब 7.7 अरब डॉलर (₹64,000 करोड़) है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के 500 से ज्यादा लड़ाकों ने 31 जनवरी को बलूचिस्तान के कई इलाकों में हमला कर 58 लोगों की हत्या कर दी थी, जिससे रेको डिक माइनिंग प्रोजेक्ट की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए। हमलावरों ने बैंक, पुलिस स्टेशन, जेल और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। कई जगहों पर आगजनी की गई और मुख्य सड़कों को जाम कर दिया गया, जिससे क्वेटा और कराची के बीच कनेक्टिविटी प्रभावित हुई। कुछ हमलावरों ने आत्मघाती विस्फोट भी किए। आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल, हमले और खतरनाक हुए रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावरों ने ऑटोमैटिक राइफल और ग्रेनेड लॉन्चर जैसे आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया। इनमें से कुछ हथियार अफगानिस्तान में 2021 के बाद छोड़े गए अमेरिकी हथियार बताए जा रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर हमला बिना लोकल समर्थन, मजबूत नेटवर्क और पर्याप्त हथियारों के मुमकिन नहीं है। रेको डिक प्रोजेक्ट पर सीधा असर हमलों का असर बलूचिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण खनन प्रोजेक्ट रेको डिक पर पड़ा। यह क्षेत्र सोना और तांबे के बड़े भंडार के लिए जाना जाता है। हमलों के बाद इस साइट तक जाने वाले रास्ते कई दिनों तक बंद रहे, जिससे ऑपरेशन प्रभावित हुआ। यह प्रोजेक्ट अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आर्थिक साझेदारी का केंद्र माना जा रहा है। अमेरिकी निवेश और विदेशी कंपनियों की चिंता अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट में करीब 1.3 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की है, जबकि कुल निवेश 2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। कनाडा की बैरिक माइनिंग कंपनी ने सुरक्षा कारणों से प्रोजेक्ट की गति धीमी कर दी है और 2027 तक देरी की बात कही है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर रेको डिक प्रोजेक्ट प्रभावित होता है, तो अमेरिका-पाकिस्तान साझेदारी को बड़ा झटका लग सकता है। BLA की बढ़ती ताकत और रणनीति में बदलाव पिछले कुछ सालों में BLA के हमले अधिक संगठित और तकनीकी रूप से मजबूत हुए हैं। यह संगठन अब सिर्फ सुरक्षा बलों ही नहीं, बल्कि नागरिकों और विदेशी निवेश को भी निशाना बना रहा है। सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में BLA अपने हमलों को ‘आजादी की लड़ाई’ के रूप में पेश करता है, जिससे उसे स्थानीय युवाओं का समर्थन मिल रहा है। अलगाववाद की जड़ें और स्थानीय असंतोष बलूचिस्तान में अलगाववाद की शुरुआत 1948 में पाकिस्तान के गठन के बाद हुई थी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनके क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का फायदा बाहरी कंपनियां और केंद्र सरकार उठाती हैं, जबकि उन्हें रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं। इसी असंतोष के कारण शिक्षित युवाओं का एक वर्ग भी उग्रवाद की ओर झुक रहा है। बलूचिस्तान की सीमा ईरान और अफगानिस्तान से लगती है। ऐसे में इन देशों में अस्थिरता का सीधा असर इस क्षेत्र पर पड़ता है। पाकिस्तानी अधिकारियों को आशंका है कि अगर ईरान के पूर्वी हिस्से में हालात बिगड़ते हैं, तो BLA जैसे संगठन और मजबूत हो सकते हैं और सीमा पार से हमले बढ़ सकते हैं। अन्य आतंकी संगठनों की मौजूदगी बलूचिस्तान में केवल BLA ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी तालिबान (TTP) और ISIS का क्षेत्रीय नेटवर्क भी सक्रिय हो रहा है। इससे सुरक्षा चुनौतियां और जटिल हो गई हैं। पाकिस्तान सरकार एक ओर सैन्य कार्रवाई के जरिए उग्रवाद को खत्म करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर रोजगार और आर्थिक सहायता के जरिए युवाओं को मुख्यधारा में लाने की योजना बना रही है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सरकार की सख्ती के चलते कई लोग लापता हो रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी और बढ़ रही है। —————- यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर मिसाइल अटैक, 7 की मौत:75 घायल; 6 PAK सैनिकों की मौत के बाद किया जवाबी हमला अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांत कुनार में सोमवार को हुए हमलों में कम से कम 7 लोगों की मौत हो गई, जबकि 75 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। घायलों में यूनिवर्सिटी के छात्र, बच्चे और आम नागरिक शामिल हैं। पढ़ें पूरी खबर…
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