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- Adani Energy Solutions Q1 Results | Net Profit Surges 124% Share Price Up
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अडाणी ग्रुप की कंपनी अडाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के नतीजे घोषित कर दिए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दोगुना से ज्यादा यानी 124% बढ़कर 1,149 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
कंपनी की कुल कमाई में तेज बढ़ोतरी और रेगुलेटरी डेफरल इनकम में आए पॉजिटिव बदलाव से नतीजों को मजबूती मिली है। नतीजों की घोषणा के बाद अडाणी एनर्जी सॉल्यूशंस का शेयर दोपहर के कारोबार में 3% चढ़कर 1,781.2 रुपए पर पहुंच गया। हालांकि, यह 1,737 रुपए पर बंद हुआ।
कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 42% बढ़ा
कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू सालाना आधार पर 42.4% बढ़कर 9,711 करोड़ रुपए हो गया है, जो पिछले साल की इसी तिमाही में 6,819 करोड़ रुपए था।
कंपनी का ऑपरेशनल मुनाफा (EBITDA) 30% बढ़कर 3,008 करोड़ रुपए रहा। हालांकि, EBITDA मार्जिन में मामूली गिरावट देखी गई और यह पिछले साल के 33.9% से घटकर 31% पर आ गया।
कंपनी को रेगुलेटरी इनकम का मिला फायदा
कंपनी ने पहली तिमाही में 29 करोड़ रुपए की रेगुलेटरी डेफरल इनकम दर्ज की है। इसकी तुलना में पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में कंपनी को 504 करोड़ रुपए का रेगुलेटरी डेफरल खर्च उठाना पड़ा था। इस पॉजिटिव बदलाव ने कंपनी के नेट मुनाफे को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
कंपनी के बिजनेस सेगमेंट का परफॉर्मेंस
कंपनी के अलग-अलग बिजनेस सेगमेंट्स में भी अच्छी ग्रोथ देखने को मिली है…
- ट्रांसमिशन बिजनेस: कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 52.4% की भारी बढ़ोतरी के साथ 3,335.3 करोड़ रुपए पहुंच गया।
- डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस: इस सेगमेंट से रेवेन्यू 5% बढ़कर 3,520.4 करोड़ रुपए हो गया।
- स्मार्ट मीटरिंग बिजनेस: इसमें 200% से अधिक की ग्रोथ दर्ज की गई और रेवेन्यू 346.9 करोड़ रुपए पर पहुंच गया।
- एनर्जी सॉल्यूशंस प्लेटफॉर्म: इस प्लेटफॉर्म से होने वाला रेवेन्यू 9 गुना से ज्यादा उछलकर 1,906.8 करोड़ रुपए दर्ज किया गया।
30 जून को समाप्त हुई तिमाही के आंकड़ों से साफ है कि अडाणी एनर्जी सॉल्यूशंस पावर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट मीटरिंग और ट्रांसमिशन नेटवर्क के विस्तार पर तेजी से ध्यान दे रही है। भारत में लगातार बढ़ती बिजली की मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के चलते कंपनी के प्रदर्शन में मजबूती बनी हुई है।
क्या होती है ‘रेगुलेटरी डेफरल इनकम’?
पावर और यूटिलिटी सेक्टर में नियामक यानी रेगुलेटर्स बिजली की दरें तय करते हैं। कई बार जब किसी तिमाही में कंपनी की लागत बढ़ती है या सरकार से मंजूर दरों के एडजस्टमेंट में समय लगता है, तो नियामक उस अंतर की रकम को भविष्य के टैरिफ में वसूलने की मंजूरी देता है। इसे अकाउंटिंग में ‘रेगुलेटरी डेफरल आय/खर्च’ के रूप में दर्ज किया जाता है। जब यह खर्च की जगह आय बनती है, तो कंपनी के प्रॉफिट पर सीधा और पॉजिटिव असर दिखता है।
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