# जानिए स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट क्या है?
स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट एक ऐसा सिस्टम है जिसमें सीमा पर केवल बाड़ (Fence) नहीं होती, बल्कि एआई (AI) आधारित निगरानी, सेंसर नेटवर्क, ड्रोन और रडार, थर्मल कैमरे, भूमिगत सेंसर, सैटेलाइट और फाइबर नेटवर्क, रियल टाइम कमांड सेंटर आदि सभी को परस्पर जोड़कर “इंटेलिजेंट बॉर्डर” बनाया जाता है।
इसे भी पढ़ें: Pakistan और Bangladesh Border पर बड़े एक्शन की तैयारी में Amit Shah, ला रहे हैं Smart Border Project, घुसपैठ पर लगेगा फुल स्टॉप
# स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में अनुप्रयुक्त तकनीकों के बारे में जानिए
सवाल है कि आखिर स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में कौन-कौन सी तकनीकें अनुप्रयुक्त होती हैं? तो यह जान लीजिए कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट में नअनुप्रयुक्त तकनीकें निम्नलिखित हैं:- पहला, थर्मल इमेजर और नाइट विजन का उपयोग किया जाता है जो रात, कोहरा, बारिश या धूलभरी आंधी में भी गतिविधि पकड़ लेते हैं। दूसरा, लेजर और इन्फ्रारेड अलार्म का उपयोग किया जाता है जिससे कोई व्यक्ति सीमा पार करे तो तुरंत अलर्ट मिलता है। तीसरा, ग्राउंड सेंसर की खासियत यह है कि ये भूमिगत सुरंग (Tunnel) या कंपन तक पहचान सकते हैं। चौथा, ड्रोन और एरोस्टेट के अनुप्रयोग से ऊपर से लगातार निगरानी होती रहती है और बड़े क्षेत्रों में तेजी से ट्रैकिंग सम्भव हो पाता है। पांचवां, रडार और सोनार के उपयोग से नदी या दलदली क्षेत्रों में नावों और गतिविधियों पर निगरानी सम्भव हो जाती है। छठा, कमांड और कंट्रोल सेंटर (Command & Control Centr) से सभी सेंसरों की जानकारी एक ही कंट्रोल रूम में पहुंचती है, जहाँ BSF/ITBP तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
# आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है?
सवाल है कि आखिर भारत को इसकी जरूरत क्यों है? तो यह जान लीजिए कि निम्नलिखित वजहों से भारत को इसकी जरूरत है:- पहला, आतंकवाद और घुसपैठ रोकने के लिए क्योंकि विशेषकर पाकिस्तान सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ बड़ी चुनौती रही है। दूसरा, अवैध प्रवासन रोकने के लिए, क्योंकि बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी और तस्करी लंबे समय से समस्या रही है। तीसरा, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत को इसकी सख्त जरूरत है, क्योंकि भारत की सीमाएँ- रेगिस्तान, पहाड़, घने जंगल, नदी क्षेत्र, दलदली इलाके से होकर गुजरती हैं, जहाँ सामान्य फेंसिंग कारगर नहीं होती। चतुर्थ,जवानों की सुरक्षा के दृष्टिगत, क्योंकि लगातार गश्त में सैनिकों की जान का जोखिम रहता है। स्मार्ट निगरानी से यह दबाव कम होगा। पांचवां, निरंतर 24×7 निगरानी हेतु, क्योंकि मानव गश्त सीमित होती है, लेकिन सेंसर और एआई (AI) चौबीसों घंटे काम कर सकते हैं।
# आखिर भारत की किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है?
सवाल है कि भारत की किन किन सीमाओं पर यह सबसे ज्यादा जरूरी है? तो यह जान लीजिए कि पहला, पाकिस्तान सीमा पर क्यों जरूरी है? यहां पर आतंकवादी घुसपैठ, ड्रोन से हथियार/नशा भेजना, सीमा पार फायरिंग, सुरंगों का उपयोग किया जाता है। सवाल है कि कहाँ कहाँ विशेष जरूरत है? तो यह समझ लीजिए कि जम्मू सेक्टर, पंजाब सीमा, राजस्थान का रेगिस्तानी क्षेत्र में इसकी सख्त जरूरत है। यही वजह है कि 2018 में जम्मू क्षेत्र में भारत का पहला स्मार्ट फेंस पायलट शुरू किया गया था।
दूसरा, बांग्लादेश सीमा पर क्यों जरूरी है? तो यह समझ लीजिए कि अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, पशु तस्करी, नदी क्षेत्रों से प्रवेश रोकने हेतु इसकी जरूरत है। यहां से जुड़े सबसे संवेदनशील क्षेत्र में असम का धुबरी क्षेत्र, पश्चिम बंगाल सीमा, त्रिपुरा और मेघालय प्रमुख हैं, जहां की नदी और दलदली इलाकों में “प्रोजेक्ट बोल्ड किट” (Project BOLD-QIT) लागू किया गया।
तीसरा, चीन सीमा पर क्यों जरूरी? बताया जाता है कि एलएसी (LAC) पर तनाव, कठिन हिमालयी इलाके, अचानक सैनिक गतिविधियाँ, मौसम संबंधी चुनौतियाँ के दृष्टिगत इसकी जरूरत समझी जाती है। जहां तक कहाँ जरूरत? जैसे सवाल की बात है तो लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम के समीप एआई (AI), ड्रोन, सैटेलाइट और हाई-एल्टीट्यूड सेंसर सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
चौथा, आखिर म्यांमार सीमा पर क्यों जरूरी है? तो बताया जाता है कि उग्रवाद, हथियार और ड्रग्स तस्करी, अवैध आवाजाही के चलते भारत ने म्यांमार सीमा पर भी स्मार्ट फेंसिंग की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
# स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे
जहां तक स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट के बड़े फायदे की बात है तो इसके सामरिक फायदे हैं- घुसपैठ में कमी, आतंकवाद पर नियंत्रण और तेज प्रतिक्रिया क्षमता। वहीं आर्थिक फायदे के तौर पर लंबी अवधि में गश्त की लागत कम होगी, तस्करी से होने वाले नुकसान में कमी आएगी। वहीं सामाजिक फायदे के तौर पर सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा भावना, जनसंख्या असंतुलन संबंधी चिंताओं पर नियंत्रण होगा। जबकि तकनीकी फायदे के रूप में मेक इन इंडिया (Make in India) रक्षा तकनीक को बढ़ावा मिलेगा तथा एआई (AI) और ड्रोन उद्योग का विकास होगा।
जहां तक चुनौतियों की बात है तो निम्नलिखित चुनौतियाँ इस राह में हैं? पहला, बहुत अधिक लागत: पूरी सीमा पर हाई-टेक सिस्टम लगाना बेहद महंगा है। दूसरा, कठिन मौसम: हिमालय, रेगिस्तान और बाढ़ वाले क्षेत्रों में तकनीक टिकाऊ बनाना चुनौती है। तीसरा, साइबर सुरक्षा: यदि सिस्टम हैक हुआ तो सुरक्षा खतरा बढ़ सकता है। चौथा, स्थानीय सहयोग: सीमावर्ती गाँवों का सहयोग जरूरी है।
सवाल है कि इसे अपनाकर भविष्य में भारत क्या कर सकता है? तो यह जान लीजिए कि एआई (AI) आधारित “Predictive Border Security”, स्वचालित ड्रोन पेट्रोलिंग, सैटेलाइट आधारित लाइव मॉनिटरिंग, रोबोटिक बॉर्डर पोस्ट और Integrated Defence Grid को अपनाकर भारत अपनी सीमा को और अधिक सुरक्षित बना सकता है।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट केवल “फेंसिंग” नहीं बल्कि भारत की सीमा सुरक्षा सोच में बड़ा बदलाव है। यह पारंपरिक चौकियों से आगे बढ़कर डेटा, AI, सेंसर और रियल टाइम निगरानी आधारित सुरक्षा मॉडल की ओर कदम है। पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर इसकी तत्काल आवश्यकता है, जबकि चीन और म्यांमार सीमा पर यह भविष्य की सामरिक जरूरत बनता जा रहा है। यदि सही तरीके से लागू हुआ, तो यह भारत की सीमा सुरक्षा को 21वीं सदी के स्तर पर ले जा सकता है।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.