अमेरिका को क्या मिला?
लेकिन इस समझौते की सबसे बड़ी कहानी उसके राजनीतिक और सामरिक निहितार्थों में छिपी है। अगर अमेरिका के नजरिए से देखें तो उसे इस समझौते से कई तात्कालिक लाभ मिले हैं। सबसे पहला लाभ यह है कि वॉशिंगटन ने एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खतरा टाल दिया। पिछले महीनों में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य झड़पें पश्चिम एशिया को व्यापक युद्ध की ओर धकेल रही थीं। अब अमेरिका ने सैन्य टकराव की जगह कूटनीतिक रास्ता चुनकर खुद को लंबी और महंगी लड़ाई से बचा लिया है। दूसरा बड़ा लाभ यह है कि ईरान ने औपचारिक रूप से दोबारा यह स्वीकार किया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में समृद्ध यूरेनियम के निस्तारण पर सहमति भी अमेरिका के लिए कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। तीसरा लाभ होरमुज जलडमरूमध्य का खुलना है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित होगी और तेल कीमतों में स्थिरता आएगी, जिसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
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लेकिन अमेरिका को इस समझौते से भारी राजनीतिक और सामरिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। अमेरिकी विपक्ष और कई रिपब्लिकन नेताओं ने इसे आत्मसमर्पण जैसा करार दिया है। आलोचकों का कहना है कि ईरान को प्रतिबंधों से राहत, तेल निर्यात की अनुमति, फ्रीज किये हुए धन की वापसी और विशाल पुनर्निर्माण पैकेज मिल गया, जबकि बदले में अमेरिका को केवल ईरान का अस्पष्ट वादा मिला है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। यह भी आशंका जताई जा रही है कि ईरान भविष्य में फिर होरमुज जलडमरूमध्य को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। कई अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञ इसे दशकों की सबसे बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा भूल बता रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि अमेरिका की कठोर शक्ति की छवि कमजोर हुई है और उसके पारंपरिक सहयोगियों में अविश्वास बढ़ा है।
ईरान को क्या मिला?
वहीं ईरान के लिए यह समझौता आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से किसी जीवनदान से कम नहीं है। वर्षों के प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह तोड़ दिया था। अब यदि प्रतिबंध हटते हैं तो ईरान को वैश्विक व्यापार, विदेशी निवेश और तेल निर्यात के रास्ते दोबारा मिल जाएंगे। अमेरिका ने फ्रीज किये हुए ईरानी धन और संपत्तियों को लौटाने की बात भी स्वीकार की है। साथ ही तीन सौ अरब डॉलर का पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास पैकेज ईरान की टूटी हुई अर्थव्यवस्था को नई सांस दे सकता है। इसके साथ ही अमेरिका ने नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और अंतिम समझौते के बाद अपने सैन्य बलों को ईरान के आसपास से हटाने का भी आश्वासन दिया है। इससे तेहरान पर वर्षों से बना सैन्य दबाव कम होगा।
रणनीतिक स्तर पर ईरान की सबसे बड़ी जीत यह है कि उसने बिना शासन परिवर्तन के अमेरिकी दबाव को झुकने पर मजबूर किया। पश्चिम एशिया में अब ईरान केवल एक अलग थलग देश नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर बराबरी से बैठा शक्ति केंद्र बनकर उभरा है। होरमुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है। साथ ही लेबनान में हिजबुल्लाह और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर भी उसे अप्रत्यक्ष बढ़त मिली है।
हालांकि ईरान के लिए खतरे भी कम नहीं हैं। उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करनी होगी। समृद्ध यूरेनियम के भंडार को नियंत्रित करने का दबाव रहेगा। यदि अंतिम समझौता नहीं हुआ तो प्रतिबंध दोबारा लौट सकते हैं। साथ ही अमेरिका और उसके सहयोगी भविष्य में किसी भी उल्लंघन को बहाना बनाकर फिर कठोर कार्रवाई कर सकते हैं। इसलिए तेहरान के लिए यह अवसर जितना बड़ा है, जोखिम भी उतना ही गहरा है।
इजराइल को क्या मिला?
इस पूरे समझौते में सबसे बड़ा झटका इजराइल को लगा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पूरी राजनीतिक छवि ईरान विरोधी कठोर नीति और अमेरिका पर प्रभाव रखने वाले नेता की रही है। लेकिन यह समझौता उस छवि को तोड़ता दिख रहा है। इजराइल के विपक्षी नेता याएर लापिद ने कहा है कि नेतन्याहू ने ऐतिहासिक जीत का वादा किया था, लेकिन परिणाम में अमेरिका के साथ संकट, ईरान के लिए खुला होरमुज, रिवोल्यूशनरी गॉर्ड्स के लिए धन और इजराइल पर तनी बैलिस्टिक मिसाइलें मिलीं।
दरअसल, इजराइल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब अमेरिका ईरान के साथ टकराव नहीं बल्कि समझौते के रास्ते पर है। इससे इजराइल की स्वतंत्र सैन्य कार्रवाई की गुंजाइश सीमित हो सकती है। लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ अभियान पर भी दबाव बढ़ा है। इजराइली सुरक्षा प्रतिष्ठान को डर है कि यह समझौता ईरान को क्षेत्रीय प्रभाव मजबूत करने का समय देगा। इस तरह नेतन्याहू अब ऐसी स्थिति में फंस गए हैं जहां उन्हें या तो अपने सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका से टकराना होगा या फिर समझौते को स्वीकार कर राजनीतिक नुकसान उठाना होगा। खासतौर पर इजराइल में जल्द ही चुनाव होने हैं ऐसे में यह समझौता उनके लिए बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन सकता है।
इजराइल के भीतर सबसे गहरी बेचैनी इस बात को लेकर भी है कि उसकी सेना ने जिन हमलों, मिसाइलों और बमबारी के जरिये ईरान की आर्थिक और सामरिक संरचना को भारी नुकसान पहुंचाया, अब उसी तबाह ढांचे को दोबारा खड़ा करने के लिए अमेरिका तीन सौ अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज देने को तैयार हो गया है। तेल अवीव में कई रणनीतिक विश्लेषक इसे इजराइल की दोहरी हार मान रहे हैं। उनका तर्क है कि एक ओर इजराइल ने वर्षों तक ईरान को कमजोर करने के लिए सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक कीमत चुकाई, जबकि अब वॉशिंगटन उसी ईरान को नई आर्थिक ताकत देने जा रहा है। इजराइली खेमे को डर है कि यह पैसा केवल पुनर्निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे ईरान अपनी सैन्य क्षमता, क्षेत्रीय नेटवर्क और हिजबुल्लाह जैसे सहयोगी संगठनों को भी फिर से मजबूत कर सकता है। यही वजह है कि इजराइल में इस समझौते को केवल कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि अमेरिका द्वारा ईरान को रणनीतिक पुनर्जीवन देने वाला कदम माना जा रहा है।
बहरहाल, यह समझौता पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय खोलता है। कागज पर यह शांति, व्यापार और स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम दिखता है, लेकिन जमीन पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या अमेरिका और ईरान वास्तव में अपने वादों को लागू कर पाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि इस समझौते ने शक्ति संतुलन बदल दिया है, अमेरिका की रणनीति को चुनौती दी है, ईरान को नई सांस दी है और इजराइल को अभूतपूर्व असुरक्षा के दौर में धकेल दिया है।
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