UPSC के 4 असफल प्रयासों के बाद एक एस्पिरेंट ने अपनी किताबें और मॉक टेस्ट कबाड़ी को बेच दिए। सालों की मेहनत की कीमत सिर्फ 464 मिली। भावुक कर देगी पूरी कहानी।
3 बार मेंस दिया, चौथी बार प्रीलिम्स भी नहीं निकला
रेडिट पर लिखी गई पोस्ट में उम्मीदवार ने अपने लंबे UPSC सफर का दर्द बयां किया। उसने बताया कि वह लगातार 2023, 2024 और 2025 में यूपीएससी मेन्स तक पहुंचा। लेकिन 2026 में उसका सफर और भी कठिन मोड़ पर पहुंच गया, जब वह पहली बार प्री भी क्लियर नहीं कर सका। उम्मीदवार ने लिखा कि तीन साल लगातार मेंस देने के बाद इस बार प्रीलिम्स में असफल होना उसके लिए यह स्वीकार करने जैसा था कि अब उसका UPSC सफर खत्म हो चुका है।
NCERT से लेकर लक्ष्मीकांत तक सब कबाड़ी के तराजू पर
उम्मीदवार ने बताया कि उसने हाल ही में अपनी वे सारी किताबें बेच दीं, जिनसे उसने कभी UPSC की तैयारी शुरू की थी। इनमें NCERT की किताबें, लक्ष्मीकांत, शुरुआती टेस्ट पेपर, मॉक टेस्ट, नोट्स और दूसरे स्टडी मैटेरियल शामिल थे। लेकिन उसके लिए ये सिर्फ पुरानी किताबें नहीं थीं। उसने लिखा कि हर किताब के कबाड़ी के ढेर में जाते ही उसके भीतर कुछ खाली-सा होता जा रहा था। क्योंकि उस ढेर में सिर्फ कागज नहीं रखे थे, बल्कि सालों की मेहनत थी। हर मेंस मॉक टेस्ट, हर प्रीलिम्स टेस्ट, सुबह 4 बजे तक बैठकर बनाई गई एनालिसिस शीट, अपनी लिखावट में तैयार किए गए नोट्स और बार-बार लिखकर सुधारे गए जवाब सब कुछ जैसे उन किताबों के साथ ही तराजू पर रखा जा रहा था।
2022 में ठुकराई थी हाई-पेइंग नौकरी
इस कहानी का एक और दर्दनाक पहलू उम्मीदवार के करियर से जुड़ा है। उसने बताया कि 2022 में उसे एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी मिली थी , लेकिन उसने UPSC की तैयारी को प्राथमिकता देने के लिए उस नौकरी को ज्वाइन नहीं किया। आज उसी फैसले को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग उसका मजाक उड़ाते हैं तो कुछ उस पर तरस खाते हैं। उम्मीदवार ने लिखा कि अगर वह उस नौकरी की आधी कमाई भी कर रहा होता, तो शायद वह आज उस दिन से ज्यादा खुश होता, जिस दिन उसे 2022 में वह ऑफर लेटर मिला था।
UPSC की तैयारी में टूट गया 4 साल पुराना रिश्ता
सिर्फ करियर ही नहीं, बल्कि इस सफर में उम्मीदवार ने अपनी निजी जिंदगी में भी बहुत कुछ खोया। उसने बताया कि UPSC की तैयारी के वर्षों के दौरान उसका चार साल पुराना रिश्ता भी खत्म हो गया। बार-बार शुरुआत करना, हर नाकामी के बाद खुद को फिर से संभालना और भीतर से लगातार यह कहना कि बस एक कोशिश और यही उसका जीवन बन गया था। उसने अपनी पोस्ट में उस जिद और उम्मीद का जिक्र किया, जो हर असफलता के बाद भी उसे दोबारा खड़ा कर देती थी।
सालों की मेहनत आखिर किलो के हिसाब से तौली गई
उम्मीदवार के मुताबिक, किताबें बेचने का सबसे कठिन हिस्सा वह था जब उसे लगा कि उसकी वर्षों की मेहनत और बलिदान आखिरकार किलोग्राम के हिसाब से तौले जा रहे हैं। उसने लिखा कि आखिरी किताब ढेर पर रखे जाने के बाद उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सालों में उसने जो जिंदगी बनाई और फिर बार-बार दोबारा बनाई, वह सब अब वजन में बदल गई है। कबाड़ी से उसकी किताबों के बदले कुल 464 रुपये मिले। वहीं, जब पास खड़े किसी व्यक्ति ने कहा कि उसे किताबों के लिए कम से कम 600 मिलने चाहिए थे, तो उम्मीदवार ने मुस्कुराते हुए कहा कि किताबों से जो मिलना था, वह तो मिला नहीं, अब 100-200 रुपये कम या ज्यादा मिलने से क्या फर्क पड़ता है।
464 रुपये मंदिर में कर दिए दान
उम्मीदवार ने बताया कि किताबों के बदले मिले पूरे 464 रुपये बाद में उसने एक मंदिर में दान कर दिए । उसने साफ किया कि यह दान किसी अगले प्रयास के लिए किस्मत या सफलता मांगने के लिए नहीं था। वह तय कर चुका है कि अब कोई अगला प्रयास नहीं होगा। उसके मुताबिक, यह बस भगवान से खामोशी में इतना कहने का एक तरीका था कि जिंदगी ने उसके साथ चाहे जितनी सख्ती की हो, लेकिन उसके भीतर देने का दिल अब भी बड़ा है।
सोशल मीडिया पर छलका दूसरे एस्पिरेंट्स का दर्द
रेडिट पर यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई मौजूदा और पूर्व UPSC उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी कहानियां साझा कीं। कई लोगों ने कहा कि सिर्फ वही व्यक्ति इस दर्द को पूरी तरह समझ सकता है, जिसने सालों तक UPSC की तैयारी की हो। एक यूजर ने लिखा कि उसकी अपनी यात्रा भी लगभग ऐसी ही रही है और पोस्ट की आखिरी पंक्तियों ने उसकी आंखों में आंसू ला दिए। वहीं, एक अन्य उम्मीदवार ने बताया कि उसने 6 बार यूपीएससी मेन्स और 1 बार इंटरव्यू तक का सफर तय किया, लेकिन चयन नहीं हो सका। उसने कहा कि तैयारी के दौरान वह अपनी महारत्न PSU की नौकरी छोड़ने की सलाह के बावजूद नौकरी पर कायम रहा और आज करियर के लिहाज से स्थिर है। उसके मुताबिक, अगर उसने नौकरी छोड़ दी होती तो शायद वह जिंदगी की बड़ी गलती साबित होती। एक अन्य यूजर ने लिखा कि ऐसी पोस्ट पढ़ना कई बार राहत देता है, क्योंकि इससे यह एहसास होता है कि इस कठिन सफर में इंसान अकेला नहीं है।
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