रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर अब धार्मिक आस्था के साथ-साथ डेस्टिनेशन वेडिंग का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में देशभर से नवयुगल शादी के लिए पहुंच रहे हैं। यहां वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह कराने की मांग लगातार बढ़ रही है। इस वर्ष जनवरी 2026 से अब तक करीब 100 विवाह यहां संपन्न हो चुके हैं। वहीं बाबा केदारनाथ के कपाट खुलने के बाद लगभग 40 शादियां आयोजित की जा चुकी हैं। केदारनाथ यात्रा शुरू होने के बाद मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में विवाह समारोहों की रौनक भी बढ़ गई है। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती ने इसी स्थान पर अखंड अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए थे। यही वजह है कि श्रद्धालु इस स्थान को वैवाहिक जीवन के लिए बेहद शुभ मानते हैं। अब धार्मिक आस्था के साथ यहां विवाह पर्यटन भी तेजी से बढ़ रहा है।
अखंड अग्नि को माना जाता है विवाह का साक्षी त्रियुगीनारायण मंदिर की सबसे बड़ी पहचान यहां जल रही अखंड अग्नि है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के समय यही अग्नि जलाई गई थी। इसे ‘धनंजय अग्नि’ कहा जाता है, जिसे आज भी अखंड माना जाता है। नवयुगल इसी अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं। श्रद्धालु इस अग्नि की राख को प्रसाद के रूप में अपने साथ ले जाते हैं और इसे वैवाहिक जीवन के लिए शुभ मानते हैं। भगवान विष्णु ने निभाई थी भाई की भूमिका धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती विवाह में माता पार्वती के भाई का कर्तव्य निभाया था। मंदिर परिसर में उनके वामन अवतार की पूजा भी की जाती है। मंदिर की स्थापत्य शैली भी लोगों को आकर्षित करती है। इसकी बनावट केदारनाथ मंदिर से मिलती-जुलती मानी जाती है, इसलिए केदारनाथ यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। केदारनाथ यात्रा शुरू होते ही बढ़ी शादियों की रौनक बाबा केदारनाथ के कपाट खुलने के बाद केदारघाटी में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ी है। इसका असर त्रियुगीनारायण मंदिर में भी दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार यात्रा शुरू होने के बाद यहां विवाह समारोहों की संख्या में तेजी आई है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में लगातार शादी कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इससे पूरे क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियां भी बढ़ी हैं। देशभर से पहुंच रहे हैं कपल अब त्रियुगीनारायण केवल स्थानीय धार्मिक स्थल नहीं रह गया है। अलग-अलग राज्यों से लोग यहां डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए पहुंच रहे हैं। कई नवयुगल पारंपरिक होटल वेडिंग की बजाय धार्मिक और शांत वातावरण में विवाह करना पसंद कर रहे हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस पवित्र स्थान पर विवाह करने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। शादी की सालगिरह मनाने भी लौट रहे दंपति तीर्थपुरोहित समिति के सदस्य राजेश भट्ट ने बताया कि यहां विवाह कराने के लिए लगातार पूछताछ बढ़ रही है। शुभ मुहूर्त के अनुसार वैदिक परंपराओं में विवाह संपन्न कराए जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई दंपति शादी के बाद अपनी सालगिरह मनाने के लिए भी त्रियुगीनारायण लौटकर पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं में इस स्थान के प्रति गहरी आस्था देखने को मिल रही है। पीएम मोदी की अपील के बाद बढ़ी पहचान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर उत्तराखंड को डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए बेहतर स्थान के रूप में प्रचारित कर चुके हैं। इसके बाद त्रियुगीनारायण मंदिर की पहचान भी तेजी से बढ़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में यहां विवाह कराने पहुंचने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ी है। सोशल मीडिया पर भी यह स्थान तेजी से लोकप्रिय हुआ है। 2024 और 2025 में भी बढ़ा था विवाह का ट्रेंड क्षेत्र से जुड़े लोगों के अनुसार 2024 में यहां करीब 600 शादियां हुई थीं। वहीं 2025 में अप्रैल माह तक ही लगभग 500 विवाह संपन्न हो चुके थे। इससे यहां डेस्टिनेशन वेडिंग के लगातार बढ़ते ट्रेंड का अंदाजा लगाया जा रहा है। स्थानीय वेडिंग प्लानरों के मुताबिक पिछले वर्षों में देश के साथ-साथ विदेशों से भी लोग यहां विवाह के लिए पहुंचे। भारतीय मूल के कई परिवारों ने भी यहां वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कराए। कई चर्चित हस्तियां भी कर चुकी हैं विवाह पिछले वर्षों में अभिनेत्री चित्रा शुक्ला, कविता कौशिक, निकिता शर्मा, गायक हंसराज रघुवंशी, यूट्यूबर आदर्श सुयाल और गढ़वाली लोकगायक सौरभ मैठाणी सहित कई चर्चित लोग यहां विवाह कर चुके हैं। इन शादियों के बाद सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर त्रियुगीनारायण की चर्चा तेजी से बढ़ी। इससे युवाओं के बीच भी यह स्थान लोकप्रिय हुआ है। मंदिर परिसर में बनाई गई है विशेष वेदी मंदिर के पुजारी सच्चिदानंद पंचपुरी के अनुसार यहां विवाह के लिए पहले से रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। माता-पिता या अभिभावकों की मौजूदगी में ही वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संपन्न कराया जाता है। सात फेरों के लिए मंदिर परिसर में विशेष वेदी बनाई गई है। इसके बाद अखंड ज्योति के साथ पगफेरा की रस्म निभाई जाती है, जबकि अन्य आयोजन आसपास के होटल और रिजॉर्ट में संपन्न होते हैं। होटल, होमस्टे और स्थानीय कारोबार को मिल रहा फायदा स्थानीय लोगों का कहना है कि विवाह समारोह बढ़ने से होटल, होमस्टे, पूजा सामग्री, ढोल-दमाऊं वादकों, फोटोग्राफरों और वेडिंग प्लानरों को रोजगार मिल रहा है। पहले यहां केवल तीर्थयात्री पहुंचते थे, लेकिन अब शादी समारोहों के कारण सालभर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। इससे स्थानीय कारोबार और पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है।
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