पैकेज्ड फूड कंपनियों पर क्या बीत रही है?
पैकेज्ड फूड कंपनियों के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। अगर भारतीय कंपनियों की बात करें तो नेस्ले इंडिया के शेयर इस साल जहां 14 प्रतिशत से अधिक चढ़े हैं तो वहीं ब्रिटानिया के शेयर करीब 10 प्रतिशत टूटे हैं। बीकाजी फूड्स तो इस साल करीब 14 प्रतिशत लुढ़क चुका है।
दूसरी ओर अमेरिकी कंपनियों की बात करें तो इस साल अब तक जनरल मिल्स के शेयरों में 25 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि कैंपबेल के शेयर करीब 24 फीसदी और कॉनाग्रा ब्रांड्स के शेयर 22 फीसदी तक लुढ़क चुके हैं। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि यह सेक्टर कितनी मुश्किल घड़ी से गुजर रहा है।
बिक्री पर असर
इंडस्ट्री एक अजीबोगरीब स्थिति में फंसी है। कीमतें बढ़ाने के बाद बिक्री की मात्रा कमजोर बनी हुई है, क्योंकि ग्राहक बढ़ते ग्रोसरी बिल से परेशान होकर खरीदारी कम कर रहे हैं। इसका हल निकालने के लिए कई फूड कंपनियां अब प्रमोशन, सस्ते ऑफर और कुछ मामलों में सीधी कीमत कटौती के जरिए मांग को फिर से बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
लागत का दबाव और मिडिल ईस्ट संकट
कंपनियों पर लागत का दबाव अभी भी बना हुआ है। मिडिल ईस्ट में जंग ने ऊर्जा की कीमतें बढ़ा दी थीं और सप्लाई चेन में बड़ी बाधाओं की आशंका पैदा कर दी थी। अगर यह दबाव लंबे समय तक रहता, तो खाद्य कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए एक और दौर की बढ़ोतरी को जायज ठहरा सकती थीं। कर्ज के बोझ से दबी कंपनियों के लिए तो मार्जिन बचाना और भी जरूरी हो जाता, भले ही इसके लिए बिक्री की मात्रा में कमी झेलनी पड़े।
अमेरिका-ईरान समझौते ने बदली तस्वीर
बार्कलेज के एनालिस्ट्स के मुताबिक, पिछले हफ्ते अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते और उसके बाद तेल की कीमतों में आई गिरावट ने फूड कंपनियों के लिए कीमतें बढ़ाना और मुश्किल कर दिया है। अब रिटेल सेलर लागत के दबाव को संरचनात्मक न मानकर अस्थायी समझने लगे हैं, जिससे कंपनियों के पास बढ़ोतरी का कोई ठोस आधार नहीं बचता।
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