पहला, भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति मजबूत होना सबसे ज्यादा मायने रखता है। जहां भारत दक्षिण कोरिया की “विशेष रणनीतिक साझेदारी” को आगे बढ़ाने के घोषणाओं से भारत को उत्तर पूर्व एशिया और इंडो पैसिफिक में एक अलग मध्य शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद मिलती है। वहीं, दक्षिण कोरिया का भारत नेतृत्व वाली पहलों जैसे इंडिया पैसिफिक ओशियन इनिशिएटिव और सोलर एलायंस में शामिल होना भारत की “मल्टी एलायंस” रणनीति को वैधता देता है।
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दूसरा, अमेरिकी चीन टकराव में एक मजबूत तीसरा धुरा, जो संतुलन कारी साबित हो सकता है। दक्षिण कोरिया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में अमेरिका का मजबूत सहयोगी है, अब भारत के साथ चिप, एआई, ऊर्जा और जल मार्ग जैसे क्षेत्रों में गहरा तकनीकी आर्थिक सहयोग बना रहा है; यह चीन केंद्रित आपूर्ति श्रृंखला से बचने के लिए “डी-रिस्किंग” रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि इससे भारत, अमेरिका जैसे देशों के लिए चीन के बिना एक वैकल्पिक टेक और विनिर्माण हब बनने की दिशा में आगे बढ़ता है, जिससे हिंद प्रशांत में चीन विरोधी छोटे गुटों के लिए भारत का भू रणनीतिक मूल्य बढ़ता है। भारत इसे भुनाने में भी पीछे नहीं रहता, ताकि भारत के पड़ोसियों से चीन के बेहतर होते सम्बन्धों को उसके पड़ोस से साधकर अपना हित वर्द्धन किया जा सके।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर इसलिए कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापार 2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने के साथ ही चिप से शिप जैसी डील्स को रफ्तार देने से दोनों देश आपूर्ति श्रृंखलाओं में आपसी निर्भरता बढ़ा रहे हैं। इससे किसी भी एक बड़े खिलाड़ी (जैसे चीन या अमेरिका) के दबाव से निकलने की लचीलापन बढ़ता है। इसके अलावा, दोनों देशों ने ऊर्जा आपूर्ति, आर्थिक सुरक्षा वार्ता और नौसैनिक लॉजिस्टिक सहयोग पर भी जोर दिया है, जिससे दक्षिण कोरिया को भी भारत के माध्यम से ईरान और मध्य पूर्व से ऊर्जा तक पहुंच के विकल्प मिलते हैं। इससे भारत को विभिन्न तरह की मजबूती मिलती है।
चौथा, चीन और उत्तर कोरिया पर निर्देशित संदेश का रणनीतिक फायदा मिलता है। भारत दक्षिण कोरिया की बढ़ती रक्षा और तकनीकी साझेदारी, खासकर चिप, एआई, डिफेंस इंडस्ट्री और नौसैनिक लॉजिस्टिक पर काम, क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर चीन की समुद्री दबाव रणनीति के खिलाफ एक छोटा बफर बनाती है। यह उत्तर कोरिया के लिए भी यह ज्यादा टेंशन वाला है, क्योंकि दक्षिण कोरिया भारत सहयोग से उसके अपने देश के खिलाफ एक और बाहरी “प्रतिनिधित्व” बनता है, जो चीन रूस के साथ उसके एकमात्र बड़े सहयोग पर भी राजनीतिक दबाव डाल सकता है।
पांचवां, भारत के भीतरी राजनीतिक लाभ महत्वपूर्ण होते हैं। भारत के लिए यह डील एक ऐसा नारा बनती है जिससे सत्ताधारी गठबंधन यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि “मल्टी एलायंस विदेश नीति” और तकनीक आधारित “वैश्विक फैक्टरी” की तस्वीर धीरे धीरे असली हो रही है। इससे चुनावी राजनीति में “मजबूत वैश्विक भागीदार” बनने की चित्रण रणनीति मजबूत होती है, खासकर जब भारत अमेरिका, जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ अलग अलग गैर आधिकारिक गुटों में एक बड़ा खिलाड़ी बन रहा है। चूंकि इससे भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है, इसलिए सराहनीय पहल है।
# 15 समझौतों में चिप और शिप से जुड़े कौन से हैं, इसे समझिए
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौतों में सीधे तौर पर “चिप” (सेमीकंडक्टर/एआई टेक) और “शिप/पोत” (जहाज निर्माण, नौवहन, स्टील, बंदरगाह) से जुड़े कुछ मुख्य सहमति पत्रक (MoUs) इस प्रकार हैं:-
पहला, चिप (सेमीकंडक्टर/एआई/टेक) से जुड़े समझौते- एआई, सेमीकंडक्टर और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में समझौते: भारत दक्षिण कोरिया के बीच एआई, सेमीकंडक्टर डिजाइन मैन्युफैक्चरिंग और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में कई सहमति पत्रक (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें साझा शोध, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्टार्टअप/कंपनी स्तरीय सहयोग जैसे बिंदु शामिल हैं।
क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और आपूर्ति शृंखला सहयोग (आर्थिक सुरक्षा वार्ता): भारत कोरिया “आर्थिक सुरक्षा वार्ता” थीम के तहत चिप आधारित क्रिटिकल टेक (सेमीकंडक्टर, एक्ज़ीक्यूटिव ग्रेड टेक) की आपूर्ति शृंखला में सहयोग बढ़ाने के MoU भी शामिल हैं।
दूसरा, शिप/जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र से जुड़े समझौते- समाचारों में “15 समझौतों” की लिस्ट के तौर पर निम्न बिंदु विशेष रूप से पोत निर्माण और समुद्री विकास सहयोग से सीधे जुड़े हैं:
पोत निर्माण (Shipbuilding): भारत दक्षिण कोरिया के बीच जहाज निर्माण और जहाज हार्डवेयर डिज़ाइन/टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर एक या अधिक सहमति पत्रक (MoUs) हुए, जिनका उद्देश्य भारत के डॉकयार्ड्स और प्राइवेट शिपबिल्डर्स को कोरिया की उन्नत जहाज निर्माण तकनीक से जोड़ना है।
स्टील/इस्पात आपूर्ति श्रंखला के लिए तकनीक और व्यापार: इस्पात उत्पादन और आपूर्ति श्रंखला (जो शिपबिल्डिंग के लिए महत्वपूर्ण है) पर तकनीक आधारित सहमति पत्रक (MoU) शामिल, जिससे भारतीय स्टील मिलों और कोरियाई शिपबिल्डर्स के बीच सीधा बंधन बढ़ेगा।
समुद्री विरासत समझौता (Maritime Heritage MoU) : भारत कोरिया के बीच समुद्री इतिहास और संस्कृति संरक्षण, म्यूजियम सहयोग और अंडरवाटर आर्कियोलॉजी जैसे प्रोजेक्टों पर सहमति पत्रक (MoU) हुआ, जो राजनीतिक सांस्कृतिक स्तर पर समुद्र केंद्रित विज़न को बढ़ावा देता है।
पोर्ट्स क्षेत्र में सहयोग: भारत और दक्षिण कोरिया ने पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर, आधुनिकीकरण और पोर्ट बेस्ड लॉजिस्टिक्स पर अलग सहमति पत्रक (MoU) शामिल किया है, जो “चिप से शिप” नारे के तहत लॉजिस्टिक्स डिजिटल हार्डवेयर चेन को जोड़ता है।
वहीं, कुल 15 समझौतों में अन्य प्रमुख क्षेत्र क्या क्या हैं, यहां जनिए
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौतों में “चिप” और “शिप” के अलावा कई अन्य प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:- पहला, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक सुरक्षा वार्ता पर एक सहमति पत्रक (MoU): दोनों देश लिक्विड नेचुरल गैस (LNG), रिन्यूएबल एनर्जी और “क्रिटिकल टेक” आपूर्ति शृंखला के संदर्भ में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। भारत कोरिया “ऊर्जा आपूर्ति” सहमति पत्रक (MoU) ने ऊर्जा आपूर्ति विविधता और आर्थिक राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा है।
दूसरा, विज्ञान, अनुसंधान और इनोवेशन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदान प्रदान : भारत की राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास एजेंसियों और दक्षिण कोरिया के विज्ञान तकनीकी संस्थानों के बीच शोध और इनोवेशन आधारित सहमति पत्रक (MoU) शामिल हैं।
वहीं, नवीनतम तकनीकों का आदान प्रदान (लेज़र, फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में): इस तरह के समझौते भारत को दक्षिण कोरिया की उन्नत रिसर्च क्षमताओं से जोड़ते हैं।
तीसरा, व्यापार, विकास और निवेश, व्यापार और विकास बैंक सहमति पत्रक (MoU): भारत के विकास बैंक (जैसे EXIM या DFDC जैसी संस्थाएँ) और दक्षिण कोरिया आधिकृत विकास वित्त संस्थानों के बीच सहयोग MoU शामिल, जो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और उद्योग प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तपोषण संरचना को सुगम बनाएगा। व्यापार लक्ष्य (2030 तक 50 अरब डॉलर) को मजबूत करने के लिए व्यापार नीति, निवेश और मानक समन्वय पर कई विशेष सहमति पत्रक (MoUs) शामिल है।
चतुर्थ, स्वास्थ्य, फार्मा और जीव विज्ञान, स्वास्थ्य और जीव विज्ञान शोध: भारत के जैव वैज्ञानिक शोध संस्थानों और दक्षिण कोरिया के फार्मा/बायोटेक संस्थानों के बीच शोध सहयोग सहमति पत्रक (MoU) है, जिसमें दवाओं, वैक्सीन और जैव तकनीकों के साझा अध्ययन शामिल हैं। इससे भारतीय फार्मा और जैव उद्योग को उन्नत टेक्नोलॉजी और वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने में मदद मिलेगी।
पांचवां, संस्कृति, शिक्षा और लोगों के बीच संबंध, संस्कृति, शिक्षा और शोध संस्थानों का सहयोग: दोनों देशों के विश्वविद्यालयों, विज्ञान संस्कृति संस्थानों के बीच शिक्षा और सांस्कृतिक आदान प्रदान सहमति पत्रक (MoUs) शामिल हैं, जिसमें छात्र विनिमय, शोध समन्वय और यूनेस्को (UNESCO) जैसे प्लेटफॉर्म पर सहयोग शामिल है।
वहीं, “कोरिया और भारत” के लोगों के बीच लिंक शैक्षणिक-सहमति पत्रक (Edu MoU): यह युवा, शिक्षक और शोधकर्ताओं को दोनों देशों के बीच लिंक करने वाला संरचनात्मक समझौता है।
छठा, आर्थिक और नीतिगत सहयोग (अन्य), वैश्विक व्यापार और नीति समन्वय: दोनों देश ने वैश्विक व्यापार नियमों, स्वतंत्र व्यापार समझौतों (जैसे भारत कोरिया CEPA) को और प्रभावी बनाने के लिए नीति समन्वय सहमति पत्रक (MoUs) जोड़े हैं।
वहीं, कस्टम सहयोग और व्यापार सुविधा: कस्टम नियमों, व्यापार बाधाओं कम करने और ई कॉमर्स/पेमेंट सिस्टम जोड़ने पर अलग से व्यवस्था संबंधी सहमति पत्रक
(MoUs) शामिल हैं।
# इन समझौतों से भारत को क्या-क्या आर्थिक लाभ होंगे?
भारत दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौते, खासकर चिप, शिप, ऊर्जा, व्यापार, विज्ञान तकनीक और नीति सहयोग के तहत, भारत के लिए कई तरह के आर्थिक लाभ ला सकते हैं। इस समझौते समूह के रूप में ये लाभ नीचे दिए गए प्रमुख सिद्धांतों पर बने हैं, विशेष रूप से भारत कोरिया विशेष रणनीतिक साझेदारी और 2030 तक 50 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य के संदर्भ से विश्लेषित तर्कों के आधार पर, इसलिए इन्हें समझिए:
पहला, विनिर्माण और निवेश उत्तेजना: चिप, शिप और भारी उद्योग में कोरियाई तकनीक और निवेश से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, जहाज निर्माण और स्टील आधारित इंडस्ट्रीज को आधुनिक क्षमता मिलेगी, जिससे घरेलू विनिर्माण लागत कम होने और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है। यह समझौता “मेक इन इंडिया” (Make in India) और “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्यों को आगे बढ़ाता है, क्योंकि कोरियाई कंपनियां भारत में ज्यादा स्थानीय उत्पादन जोड़ी बना सकती हैं, जिससे रोज़गार और टैक्स बेस दोनों को लाभ मिल सकता है।
दूसरा, व्यापार और एक्सपोर्ट बढ़ोतरी: 2030 तक भारत कोरिया व्यापार 50 अरब डॉलर तक बढ़ने के लक्ष्य से भारतीय निर्यातकों को एक नया और परिपक्व बाज़ार मिलता है, खासकर आईटी सेवाएँ, फार्मा उत्पाद, जैव उद्योग, मशीनरी और इंजीनियरिंग गुड्स के लिए।
दोनों देशों के बीच सीपीपीए (CEPA) जैसी व्यापार सुविधा वाले समझौते (या उनके विस्तार) से टैरिफ कम होने, रेगुलेटरी बैरियर कम करने और स्टैंडर्ड हार्मोनाइज़ेशन से भारतीय उत्पादों को कोरिया में बेहतर पहुंच मिलेगी।
तीसरा, ऊर्जा सुरक्षा और लागत नियंत्रण: ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक सुरक्षा वार्ता पर सहमति पत्रक (MoU) से भारत लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) और अन्य ऊर्जा स्रोतों के लिए विविध आपूर्ति स्रोत बना सकता है, जिससे ऊर्जा आयात बिल में अस्थिरता और लागत की वृद्धि रोकने में मदद मिलेगी। यह भारत की “डी-रिस्किंग” (de risking) रणनीति को बढ़ावा देगा, जिससे ऊर्जा आपूर्ति में चीन या किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता कम होगी और घरेलू औद्योगिक उत्पादन की लागत अधिक पूर्वानुमान योग्य रहेगी।
चौथा, टेक्नोलॉजी आधारित उद्योगों में लागत और उत्पादकता: एआई (AI), सेमीकंडक्टर और उन्नत टेक्नोलॉजी के सहयोग से भारतीय उद्योगों (जैसे ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर) में उत्पादकता बढ़ेगी और ऑटोमेशन के माध्यम से लागत प्रति यूनिट घटेगी, जिससे निर्यात की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। शिपबिल्डिंग और पोर्ट टेक्नोलॉजी से लॉजिस्टिक्स खर्च कम होने से भारतीय निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमत प्रतिस्पर्धा और समय पाबंद डिलीवरी के लिहाज से मजबूत होंगे।
पांचवां, रोज़गार और मैन्युफैक्चरिंग लिंकेज: चिप आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स, जहाज निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे क्षेत्रों में कोरियाई तकनीक सहायता और निवेश से हाई स्किल और मिड स्किल दोनों तरह के रोज़गार बढ़ेंगे, खासकर राज्य–स्तरीय औद्योगिक क्लस्टर और स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स में। यह समझौता उन राज्यों के लिए भी फायदेमंद होगा जहाँ जहाज निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स पार्क और ऑटोमोबाइल हब विकसित हो रहे हैं, क्योंकि कोरियाई निवेश सीधे उन क्षेत्रों में जाएगा।
छठा, बौद्धिक संपदा और इनोवेशन अर्थव्यवस्था : विज्ञान, बायोटेक और फार्मा शोध सहयोग सहमति पत्रक (MoUs) से भारतीय निजी और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों को डेटा शेयरिंग, कोरियाई पेटेंट लाइसेंसिंग और जॉइंट रिसर्च प्रोजेक्ट्स के अवसर मिलेंगे, जिससे बौद्धिक संपदा आधारित निर्यात (जैसे एपीआई, बायोफार्मास्युटिकल उत्पाद) बढ़ सकता है।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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