आज के माता-पिता एक अजीब दुविधा में फंसे हैं। एक तरफ बच्चों का स्क्रीन-टाइम बढ़ने का डर, दूसरी ओर काम और व्यस्त जीवन। इसी खाली जगह में एंट्री कर रहे हैं नए जमाने के एआई आधारित, ‘स्क्रीन-फ्री’ खिलौने। दावा है कि बच्चों के दोस्त भी हैं, शिक्षक भी और स्क्रीन की लत से बचाने का सुरक्षित रास्ता भी। लेकिन क्या तकनीक से लैस ये खिलौने सच में स्क्रीन-फ्री हैं या सिर्फ माता-पिता के अपराधबोध को कम करने का नया तरीका भर हैं? अमेरिका और यूरोप में तेजी से ऐसे खिलौने आ रहे हैं, जो दिखने में सॉफ्ट टॉय हैं, लेकिन अंदर एआई है। ये खिलौने बच्चों से बात करते हैं। सवालों के जवाब देते हैं। कहानियां सुनाते हैं और यहां तक कि होमवर्क में भी मदद करते हैं। कंपनियों का दावा है कि इनमें कोई स्क्रीन नहीं है। ना मोबाइल, टैबलेट, ना टीवी। बाजार में एक ऐसा स्मार्ट खिलौना आ गया है, जो 27 भाषाओं में बात करता है। इसकी कीमत करीब 28 हजार रु. है। माता-पिता के लिए इसमें एक एप भी है, जिससे वे बच्चे और खिलौने में हुई बातचीत भी देख सकते हैं। माता-पिता को क्यों पसंद हैं ये खिलौने बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ‘आज के माता-पिता खुद स्क्रीन के दौर में पले हैं और अब बच्चों को उससे बचाना चाहते हैं। लेकिन पूरी तरह समय देना हर किसी के लिए संभव नहीं। ऐसे में यह खिलौने ‘सुरक्षित साथी’ का भ्रम देते हैं। माता-पिता का अपराध बोध कम होता है।’ टेक विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन न होना और टेक्नोलॉजी न होना, दो अलग बातें हैं। इन खिलौनों में वही कंप्यूटिंग पावर है, जो स्मार्ट डिवाइस में होती है। बस इंटरफेस बदला है। ऐसे खिलौने स्क्रीन-फ्री जरूर हैं, लेकिन डिजिटल इंटरएक्शन से मुक्त नहीं हैं। यानी स्क्रीन न दिखे, पर एल्गोरिद्म, डेटा और एआई मौजूद हैं। खतरा – दिमाग मशीन की नकल करने लगता है डिजिटल पैरेंटिंग पर काम करने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे बच्चों की कल्पनाशीलता और इंसानी बातचीत पर असर पड़ सकता है। इसका फायदा यह है कि बच्चे लंबे समय तक मोबाइल नहीं पकड़ते। खतरा है कि भावनात्मक जुड़ाव मशीन से बनने लगता है। बच्चों का मानसिक स्तर इंसानी होने के बजाय मशीन की नकल करने लगता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स कह चुका है कि बच्चों के लिए तकनीक का उपयोग कम, उद्देश्यपूर्ण और माता-पिता की मौजूदगी में होना चाहिए। बच्चे से मानवीय बातचीत, खेल और इंसानी संबंधों का होना जरूरीं है।
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