सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मध्य प्रदेश से उनके राज्यसभा नामांकन को रद्द किए जाने को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि अदालतें चल रही चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकतीं और उनके पास चुनाव याचिका दायर करने का ही रास्ता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा कि स्थापित कानूनी स्थिति के अनुसार चुनाव के दौरान न्यायिक दखल की मनाही है, और इस चरण पर कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की नटराजन की कोशिश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने गौर किया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने नटराजन का नॉमिनेशन इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उन्होंने अधूरा ‘फॉर्म 26’ हलफनामा दाखिल किया था और अपने खिलाफ लंबित शिकायत मामले की जानकारी नहीं दी थी।
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रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश में यह भी दर्ज था कि नटराजन ने शिकायत की कार्यवाही में लिखित दलीलें दी थीं और इसलिए उन्हें मामले की जानकारी थी। बेंच ने यह भी गौर किया कि नटराजन ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले के खिलाफ चुनाव आयोग से संपर्क किया था और लिखित में अपनी बात रखी थी। उन्होंने 10 जून को पूरे चुनाव आयोग के सामने खुद अपना पक्ष भी रखा था, लेकिन उनकी अर्जी पर कोई आदेश जारी नहीं किया गया। नटराजन की ओर से पेश हुए सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि संविधान के आर्टिकल 329(b) के तहत रोक लागू नहीं होती, क्योंकि याचिका का मकसद निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करना था, न कि चुनाव में बाधा डालना।
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उन्होंने तर्क दिया कि नॉमिनेशन को खारिज करना साफ तौर पर गैर-कानूनी था, क्योंकि जिस शिकायत के आधार पर यह विवाद खड़ा हुआ था, उसमें न तो मामले का संज्ञान लिया गया था और न ही आरोप तय किए गए थे। सिंघवी ने मोहिंदर सिंह गिल और अशोक कुमार जैसे मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संवैधानिक अदालतें खास हालात में दखल दे सकती हैं, बशर्ते ऐसा दखल चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने के बजाय उसमें मदद करे। चुनाव आयोग, चुने गए उम्मीदवार और दूसरे प्रतिवादियों ने इस याचिका का विरोध किया। उनका तर्क था कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और कानून के स्थापित नियम के अनुसार, जिस उम्मीदवार का नामांकन रद्द हुआ हो, उसके पास केवल चुनाव याचिका के ज़रिए ही उपाय उपलब्ध होता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि फ़ॉर्म 26 में सभी लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देना ज़रूरी है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान नामांकन रद्द होने को चुनौती देने के लिए न तो अनुच्छेद 32 और न ही अनुच्छेद 226 का सहारा लिया जा सकता है।
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