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विमानन नियामक DGCA की देखरेख में 27 जून को इसका ट्रायल किया।- फाइल फोटो
अब खराब विजिबिलिटी में भी प्लेन सुरक्षित लैंड कर सकेंगे। क्योंकि, भारत में पहली बार किसी बड़े कॉमर्शियल जेट को ग्राउंड से रेडियो सिग्नल भेजे बिना सीधे सैटेलाइट सिग्नल्स की मदद से सुरक्षित उतारने का सफल ट्रायल कर लिया गया है।
विमानन नियामक DGCA की देखरेख में 27 जून को इंडिगो एयरलाइंस के एयरबस A320 विमान ने स्वदेशी ‘गगन’ नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर यह ऐतिहासिक लैंडिंग की। हालांकि इंडिगो ने 2022 में छोटे ATR विमानों पर इसका परीक्षण किया था, लेकिन बड़े कॉमर्शियल जेट के साथ देश में यह पहला सफल ट्रायल है।
इसे ऐसे समझें
पहले: जैसे रास्ता पूछने के लिए आपको हर चौराहे पर किसी व्यक्ति की मदद चाहिए। अब: आपके फोन में GPS हो और वह सीधे सैटेलाइट से रास्ता बताता रहे।
विमान के लिए भी यही हुआ। अब उसे एयरपोर्ट के रेडियो उपकरणों पर कम निर्भर रहना पड़ेगा और सैटेलाइट आधारित ‘गगन’ सिस्टम उसे अधिक सटीक तरीके से रनवे तक पहुंचाएगा।
इससे क्या फायदा होगा
- कोहरे, बारिश और खराब विजिबिलिटी में भी सुरक्षित लैंडिंग आसान होगी।
- जिन एयरपोर्ट्स पर महंगे ग्राउंड रेडियो सिस्टम नहीं हैं, वहां भी आधुनिक नेविगेशन की सुविधा मिल सकेगी।
- पायलट को विमान की स्थिति की ज्यादा सटीक जानकारी मिलेगी, जिससे सुरक्षा बढ़ेगी।

5 सवाल-जवाब से जानिए गगन सिस्टम के बारे में…
सवाल: क्या है स्वदेशी गगन सिस्टम?
जवाब: गगन का पूरा नाम ‘जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन (GAGAN) है। यह भारत का अपना सैटेलाइट-बेस्ड ऑगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने मिलकर तैयार किया है।
गगन, भारत के नाविक या अमेरिका के GPS की तरह कोई स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम नहीं है, जो सीधे लोकेशन बताता हो। बल्कि, यह पहले से मौजूद GPS सिग्नल्स की कमियों और गलतियों को ठीक करके उन्हें विमानों के लिए और ज्यादा सटीक व भरोसेमंद बनाता है।
सवाल: सैटेलाइट लैंडिंग पारंपरिक सिस्टम से कैसे अलग है?
जवाब: आमतौर पर बड़े और प्रमुख एयरपोर्ट्स पर विमानों को उतारने के लिए इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत रनवे के आसपास महंगे ग्राउंड-बेस्ड उपकरण और रेडियो बीम लगाए जाते हैं, जो पायलट को रनवे का सटीक रास्ता बताते हैं।
इसके उलट, 27 जून को हुए टेस्ट में सैटेलाइट-बेस्ड लैंडिंग सिस्टम (SLS) का इस्तेमाल किया गया। इस तकनीक में जमीन पर लगे भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती, बल्कि आसमान में मौजूद सैटेलाइट्स सीधे प्लेन को गाइड करते हैं। प्लेन में बैठे यात्रियों को इस बदलाव का बिल्कुल भी अहसास नहीं हुआ, लेकिन एविएशन सेफ्टी और खर्च के लिहाज से यह बेहद क्रांतिकारी बदलाव है।
सवाल: यह तकनीक छोटे एयरपोर्ट्स के लिए गेम चेंजर क्यों हो सकती है?
जवाब: भारत के कई छोटे और सेकेंडरी शहरों के एयरपोर्ट्स पर ILS सिस्टम नहीं लगा है। इसका कारण इसकी भारी-भरकम इंस्टॉलेशन कॉस्ट और हर महीने रखरखाव पर होने वाला बड़ा खर्च है।
सैटेलाइट गाइडेड सिस्टम आने से अब इन छोटे एयरपोर्ट्स पर भी खराब मौसम या कम विजिबिलिटी के दौरान विमानों की सटीक और सुरक्षित लैंडिंग कराई जा सकेगी।
विमान बनाने वाली दिग्गज कंपनी ‘एयरबस’ के मुताबिक, यह तकनीक पायलटों को खराब मौसम में भी बिना किसी अतिरिक्त एयरपोर्ट इक्विपमेंट के स्थिर और सीधी अप्रोच बनाने में मदद करती है। मुख्य सिस्टम के फेल होने या मेंटेनेंस के वक्त यह एक बेहतरीन बैकअप की तरह भी काम करेगा।
सवाल: स्मार्टफोन वाला GPS प्लेन क्यों नहीं उतार सकता?
जवाब: हमारे स्मार्टफोन में जो GPS होता है, वह कुछ मीटर तक की सटीकता देता है, जो सड़क पर रास्ता ढूंढने के लिए तो ठीक है लेकिन बादलों के बीच से आ रहे तेज रफ्तार कमर्शियल विमान को सुरक्षित रनवे पर उतारने के लिए काफी नहीं है।
जब GPS सिग्नल्स अंतरिक्ष से जमीन की तरफ आते हैं, तो वायुमंडल की ऊपरी परत (आयनोस्फीयर) के कारण उनमें थोड़ी देरी और गड़बड़ी आ जाती है। भारत के ऊपर यह गड़बड़ी और तेजी से बदलती है क्योंकि हमारा देश इक्वेटोरियल आयनाइजेशन एनोमली के ठीक नीचे आता है। विमानों को सटीक लैंडिंग के लिए न सिर्फ एकदम सटीक डेटा चाहिए होता है, बल्कि इस बात की गारंटी भी चाहिए होती है कि जो डेटा मिल रहा है, वह 100% सही है।
सवाल: इस साल 40 से ज्यादा एयरपोर्ट्स पर सुविधा मिलेगी
जवाब: इंडिगो अब इस सैटेलाइट-बेस्ड तकनीक को अपने पूरे बेड़े में तेजी से लागू कर रहा है। भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने देश के कई एयरपोर्ट्स पर पहले ही 23 सैटेलाइट गाइडेड अप्रोच प्रोसीजर पब्लिश कर दिए हैं और उम्मीद है कि इस साल के अंत तक यह संख्या 40 के पार चली जाएगी।
इसरो के मुताबिक, गगन सिस्टम के दो मुख्य लक्ष्य हैं- पहला, नागरिक उड्डयन को बेहद सुरक्षित और सटीक बनाना और दूसरा, विमानों को सीधे और छोटे रूट्स पर उड़ाकर एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट को बेहतर करना है, जिससे ईंधन की बचत हो सके।
यह सिस्टम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया गया है, जिससे विदेशी सीमाओं को पार करते समय भी विमान बिना किसी रुकावट के नेविगेट कर सकेंगे। कमर्शियल जेट की यह पहली सफल लैंडिंग भारत के तेजी से बढ़ते एविएशन नेटवर्क को अधिक सुलभ और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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