सलिन अंकोला ने 1989 में सचिन तेंदुलकर के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया लेकिन उनका करियर सिर्फ 1 टेस्ट और 20 वनडे मैचों तक सिमटकर रह गया। उन्होंने घरेलू क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन किया। कई बार भारतीय टीम में अंदर-बाहर हुए लेकिन अंत में चोट के कारण 28 की उम्र में संन्यास लेना पड़ा।
करांची का ऐतिहासिक टेस्ट मैच और करियर समाप्त
हम बात कर रहे हैं सलिल अंकोला की। एक ऐसा क्रिकेटर जिसमें भारत का बड़ा गेंदबाज बनने की काबिलियत थी। एक बेहतर ऑलराउंडर के रूप में खुद को स्थापित करने का मौका था, लेकिन चोटों का ऐसा दौर शुरू हुआ कि वे कभी बड़ी उपलब्धियों को वरण नहीं कर सके। साल था 1989 का और तारीख थी 15 नवंबर। चार युवा क्रिकेटरों ने कराची के राष्ट्रीय स्टेडियम में अपने टेस्ट करियर की शुरुआत की। इनमें से एक 16 वर्षीय भारतीय खिलाड़ी था, जिसका नाम आगे चलकर क्रिकेट के साथ अटूट रूप से जुड़ गया। वे क्रिकेट के भगवान कहलाए। दूसरा 18 वर्षीय पाकिस्तानी तेज गेंदबाज था जो आगे चलकर रिवर्स स्विंग का बादशाह बना। सचिन तेंदुलकर ने अपने करियर में 200 टेस्ट मैच खेले और 15,921 रन बनाए। वकार यूनिस ने 87 टेस्ट मैच खेले, 373 विकेट लिए और पाकिस्तान के महान खिलाड़ियों में शुमार हुए। लेकिन कराची के उस मैच में क्रिकेट के दो बिल्कुल विपरीत छोरों पर खड़े दो खिलाड़ियों का करियर भी शुरू हुआ था। दूसरे पाकिस्तानी डेब्यू करने वाले खिलाड़ी शाहिद सईद ने फिर कभी टेस्ट मैच नहीं खेला। भारत के नए चेहरों में से एक के साथ भी यही वाकया रिपीट हुआ। यह अटल सत्य है कि सलिल अंकोला ने सिर्फ एक ही टेस्ट मैच में हिस्सा लिया, जो सचिन तेंदुलकर और वकार यूनिस का भी डेब्यू मैच था। 21 साल की उम्र में, यह सोचना मुश्किल था कि उनका पहला टेस्ट मैच ही उनका आखिरी मैच होगा, लेकिन नियति को यही मंजूर था।
वैभव सूर्यवंशी- सचिन की तरह नहीं, लेकिन तेजी से हुआ उदय
अंकोला का उदय भारतीय क्रिकेट में तेजी से हुआ। बेशक उतनी तेजी से नहीं, जितनी तेजी से सचिन तेंदुलकर या वैभव सूर्यवंशी उभरे, लेकिन उतनी तेजी से जरूर, जितने में सामान्य क्रिकेटर इंटरनेशनल खेलने की उम्मीदें भी नहीं पालते। दाएं हाथ के इस तेज गेंदबाज ने 1988-89 सत्र में महाराष्ट्र के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया और गुजरात के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने एक ही पारी में 43 रन बनाए और छह विकेट लिए, जिसमें एक हैट्रिक भी शामिल थी। उन्हें ज्यादा समय तक जमने की जरूरत नहीं पड़ी। इसके तुरंत बाद बड़ौदा के खिलाफ अंकोला ने एक और छह विकेट लिए और 6/51 का आंकड़ा दर्ज किया। अपने पहले सत्र के अंत तक, उन्होंने 20.18 के औसत से 27 विकेट लिए थे, जिसमें तीन बार पांच विकेट लेने का कारनामा शामिल था। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में एक युवा भारतीय तेज गेंदबाज के लिए, ये आंकड़े नजरअंदाज करना मुश्किल था। अंकोला को 1989 में भारत के पाकिस्तान के कठिन दौरे के लिए चुना गया, जहां मेजबान टीम में इमरान खान, वसीम अकरम और उभरते हुए वकार जैसे खिलाड़ी मौजूद थे। टेस्ट मैच शुरू होने से पहले ही अंकोला ने अपनी दावेदारी मजबूत कर ली थी। बीसीपी पैट्रन्स इलेवन के खिलाफ एक दौरे के मैच में, उन्होंने पहली पारी में 6/77 विकेट लिए और दूसरी पारी में दो और विकेट जोड़े। इसके बाद भारत ने उन्हें कराची में टेस्ट डेब्यू का मौका दिया। बेशक वह मैच सचिन तेंदुलकर और वकार के लिए याद किया जाता है, लेकिन अंकोला ने भी विकेट लिए बिना मैच नहीं छोड़ा था। उनका पहला टेस्ट विकेट सलीम मलिक थे, जिन्हें मोहम्मद अजहरुद्दीन ने 36 रन पर कैच किया। पाकिस्तान की दूसरी पारी में, उन्होंने विकेटकीपर सलीम यूसुफ को आउट किया और अपने डेब्यू मैच में दो विकेट लिए। ये उनके द्वारा लिए गए एकमात्र दो टेस्ट विकेट रहे।
वर्ल्ड कप में चयन हुआ, लेकिन 1 ही मैच खेल सके
कराची टेस्ट के बाद अंकोला चोटिल हो गए और चार मैचों की सीरीज के बाकी बचे मैचों में नहीं खेल पाए। शुरुआत में जो चोट मामूली लग रही थी, वह अंत तक गंभीर हो गई। हालांकि, बाद में भी उन्हें भारतीय टीम में शामिल किया गया, लेकिन उन्हें फिर कभी टेस्ट मैच खेलने का मौका नहीं मिला। यह सत्य है कि इस टेस्ट मैच के बाद उनका अंतरराष्ट्रीय करियर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। अंकोला ने उसी पाकिस्तान दौरे पर अपना वनडे डेब्यू भी किया और अगले कई वर्षों तक वे बीच-बीच में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी करते रहे, लेकिन इन सबके बावजूद टेस्ट क्रिकेट खेलने और उसमें बड़ा नाम कमाने का उनका सपना साकार नहीं हो सका। टेस्ट में ना सही, वनडे क्रिकेट में ही भारत ने उनमें जो पहली बार जो देखा था, उसकी झलक फिर से दिखाई दी। 1993 के हीरो कप में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मोहाली में अंकोला ने 3/33 का शानदार प्रदर्शन किया। यह उनके वनडे करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। उन्होंने 1994 में न्यूजीलैंड के भारतीय दौरे पर चार वनडे मैच खेले। घरेलू मैदान पर खेले जाने वाले 1996 विश्व कप के लिए उनका चयन भी हुआ। लेकिन विश्व कप का मौका भी उन्हें उसी पुरानी निराशा के साथ मिला। अंकोला ने टूर्नामेंट में केवल एक ही मैच खेला, दिल्ली में भावी चैंपियन श्रीलंका के खिलाफ। उन्होंने पांच ओवर में 28 रन दिए और एक भी विकेट नहीं लिया। श्रीलंका ने भारत के 271 रनों के लक्ष्य का आसानी से पीछा कर लिया। 1989-90 में शुरू हुआ उनका वनडे करियर फरवरी 1997 तक चला, लेकिन यह सात वर्षों से अधिक समय में केवल 20 मैचों तक ही सीमित रहा। उन्होंने 47.30 की औसत से 13 विकेट लिए। ये आंकड़े उनके घरेलू करियर से बिलकुल अलग थे।
घरेलू क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन, 28 की उम्र में लेना पड़ा संन्यास
अंकोला के घरेलू क्रिकेट करियर की बात की जाए तो यह बेहद प्रभावशाली है। उन्होंने 54 प्रथम श्रेणी मैचों में 26 से कम की शानदार औसत के साथ 181 विकेट लिए। उन्होंने आठ बार पांच विकेट लेने का कारनामा किया। उनकी सर्वश्रेष्ठ पारी का प्रदर्शन 6/47 रहा। लेकिन चोटें उनके लिए लगातार परेशानी का सबब बनी रहीं। अंकोला ने मुंबई के तेज गेंदबाजी कार्यक्रम से जुड़े इंग्लैंड के पूर्व तेज गेंदबाज फ्रैंक टायसन के साथ प्रशिक्षण लिया और अपने एक्शन में बदलाव किया। रन-अप को छोटा किया ताकि शरीर पर कम दबाव पड़े और गेंद पर उनका नियंत्रण बेहतर हो सके। वापसी हुई, चयन हुए और नई उम्मीदें जगीं, लेकिन भारत के लिए कभी भी लगातार जीत का सिलसिला नहीं कायम हो पाया। एक ऐसे दौर में जब जवागल श्रीनाथ ने भारत के प्रमुख तेज गेंदबाज के रूप में अपनी पहचान बनाई और मनोज प्रभाकर, वेंकटेश प्रसाद और अन्य जैसे खिलाड़ी टीम में जगह बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, अंकोला हाशिये पर ही रहे। 1997 तक उनका क्रिकेट करियर लगभग समाप्त हो चुका था। पिंडली (काफ मसल) में हड्डी के ट्यूमर के कारण महज 28 वर्ष की आयु में उन्हें क्रिकेट से असमय संन्यास लेना पड़ा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में इतनी शानदार शुरुआत करने वाले खिलाड़ी के लिए यह एक दर्दनाक और चुभन भरा अंत था। इसके बाद अंकोला ने एक ऐसा रास्ता अपनाया जो बहुत कम भारतीय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने चुना है। उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा, टेलीविजन धारावाहिकों और फिल्मों में काम किया। अंततः प्रशासनिक भूमिकाओं में क्रिकेट में वापसी की। वे मुंबई के मुख्य चयनकर्ता बने और बाद में भारत की वरिष्ठ पुरुष राष्ट्रीय चयन समिति में भी शामिल रहे।
हाल ही में अवसाद में रहे, इलाज कराया, अब सामान्य हैं
हाल ही में, अंकोला ने क्रिकेट से इतर एक और कठिन संघर्ष के बारे में खुलकर बात की है। 2026 में, उन्होंने पुणे के पास एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में गंभीर अवसाद का इलाज कराया। वे अपनी मां की मृत्यु और अन्य व्यक्तिगत कठिनाइयों से जूझ रहे थे। जुलाई में एचटी सिटी को दिए एक साक्षात्कार में, अंकोला ने कहा कि उपचार से उन्हें काफी मदद मिली है और अब वे ‘काफी बेहतर और शांत’महसूस कर रहे हैं। उन्होंने अवसाद से जूझ रहे लोगों से आग्रह किया कि वे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को अपने ऊपर हावी न होने दें और पेशेवर मदद लें। नियति का खेल देखिए प्रतिभा होने के बावजूद यह क्रिकेटर कहां रहा और उनके साथ डेब्यू करने वाले खिलाड़ी आज किस मुकाम पर हैं। हालांकि, उनकी क्रिकेट कहानी कराची से हमेशा जुड़ी रहेगी। उसी नवंबर की सुबह, तेंदुलकर, वकार और अंकोला तीनों ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला था। नेशनल स्टेडियम में खड़े किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि उनका करियर उन्हें कहां ले जाएगा। तेंदुलकर अगले 24 वर्षों तक टेस्ट क्रिकेट खेलते रहे। वकार ने सैकड़ों विकेट लिए और बल्लेबाजों की एक पीढ़ी को आतंकित किया। अंकोला ने उस मैच में दो विकेट लिए, चोटिल होकर मैदान से बाहर चले गए और फिर कभी भारत की टेस्ट कैप नहीं पहनी।
कभी-कभी ऐतिहासिक पदार्पण और भुला दिए गए करियर के बीच का अंतर वर्षों में नहीं मापा जाता। सलिल अंकोला के लिए, यह अंतर एक टेस्ट मैच में ही तय हो गया।
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