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रुपया आज 19 मई को डॉलर के मुकाबले 18 पैसे गिरकर पहली बार 96.47 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इससे पहले सोमवार को रुपया 96.29 के स्तर पर बंद हुआ था। पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट जारी है।
साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं हुआ, तो रुपया जल्द ही 100 के स्तर को भी छू सकता है।

रुपए में गिरावट के प्रमुख कारण
अमेरिका-इरान युद्ध और पश्चिम एशिया संकट: मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता के चलते ग्लोबल मार्केट में डर का माहौल है, जिससे निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) से पैसा निकाल रहे हैं।
क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें उछलकर 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ गया है और डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी है।
होर्मुज रूट की नाकेबंदी: खाड़ी देशों से तेल सप्लाई के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते ‘होर्मुज स्ट्रेट’ पर नाकेबंदी और रुकावटों की वजह से तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
विदेशी निवेशकों (FII) की बिकवाली: वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता को देखते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपने पैसे निकाले हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर डॉलर में बदलते हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ता है।
मजबूत डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी: सुरक्षित निवेश के रूप में दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है, जिससे डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है। इसके साथ ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण निवेशकों के लिए डॉलर में निवेश करना ज्यादा फायदेमंद हो गया है।
डॉलर महंगा होने से भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा
मिडिल ईस्ट संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर एनर्जी संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है।
- तेल की कीमतें: कच्चे तेल महंगे होने से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा है।
- जरूरी सामान महंगा: LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित।
- महंगाई का डर: डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और इम्पोर्टेड सामान महंगे होंगे, जिससे रिटेल महंगाई बढ़ सकती है।
- विदेश में पढ़ाई-घूमना महंगा: विदेश जाने या पढ़ाई के लिए डॉलर खरीदने पर अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे।
- इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे: मोबाइल, लैपटॉप और आयातित पार्ट्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि भुगतान डॉलर में होता है।

करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
डॉलर के मुकाबले किसी करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना या कमजोरी (करेंसी डेप्रिसिएशन) कहते हैं।
हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन होते हैं। इसके घटने-बढ़ने का असर करेंसी पर पड़ता है।
अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर पर्याप्त होंगे तो रुपया स्थिर रहेगा। डॉलर घटे तो रुपया कमजोर, बढ़े तो मजबूत होगा।
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