जन्म और परिवार
गुजरात के नवासी में 03 मार्च 1839 को जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम नौशरवांजी पारसी था, जोकि पादरियों के वंश में पहले व्यापारी थे। महज 14 साल की उम्र में ही जमशेदजी टाटा ने अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरूकर दिया था। साल 1858 में जमशेदजी ने एल्फिस्टन कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पूरी तरह से व्यवयास से जुड़ गए।
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अफीम का व्यवसाय
जमशेदजी टाटा के पिता की निर्यात कंपनी की शाखाएं चीन, यूरोप, जापान और अमेरिका में थीं। साल 1857 के विद्रोह की स्थितियों की वजह से उस समय व्यवसाय चलाना मुश्किल था। नुसेरवानजी टाटा नियमित रूप से चीन जाया करते थे और अफीम का व्यवसाय करते थे। उनके पिता ने जमशेदजी टाटा को चीन भेजा, ताकि वह अफीम के बिजनेस की बारीकियां सीख सकें। जब वह चीन गए तो देखा कि कपड़े के व्यवसाय में भविष्य है। 29 साल की उम्र तो जमशेदजी ने अपने पिता के व्यवसाय में काम किया। फिर साल 1868 में उन्होंने 21 हजार रुपए से एक व्यवसाय खोला।
उम्मीद के विपरीत मिली सफलता
जमशेदजी टाटा ने चिंचपोकली में दिवालिया तेल के कारखाने को खरीदा और इस फैक्टी को रुई की फैक्ट्री में बदल दिया। दो साल बाद इस फैक्ट्री को मुनाफे में बेच दिया। इसके बाद जमशेदजी ने नागपुर में रुई का कारखाना खोला और वहीं कपड़े का भी कारखाना खोला। लोगों को हैरानी हुई कि मुंबई जैसी जगह को छोड़कर उन्होंने नागपुर क्यों चुना। लेकिन इसमें भी उनको सफलता मिली और साल 1877 में उन्होंने नागपुर में एक मिल और खोल ली।
जमशेदजी के जीवन के चार लक्ष्य
जमशेदजी टाटा के जीवन के चार लक्ष्य थे। वह एक स्टील कंपनी खोलना चाहते थे, एक विश्वस्तरीय प्रशिक्षण संस्थान, एक खास तरह का होटल और एक हाइ़ड्रोइलेक्ट्रिक संयंत्र खोलना चाहते थे। लेकिन जमशेदजी टाटा अपने जीवन में सिर्फ होटल खोलने का सपना पूरा कर सके। 03 दिसंबर 1903 को जब मुंबई में ताज होटल खुला, तो उस समय वह भारत का एकमात्र ऐसा होटल था, जहां पर बिजली थी। बाकी के सपने उनके वंशजों ने पूरे किए थे।
मृत्यु
वहीं 19 मई 1904 को जमशेदजी टाटा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
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