क्या था पूरा मामला?
यह मामला शिवानी तोमर नाम की एक महिला का है। वह साल 2010 से ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की हेल्थ पॉलिसी ले रही थीं। नवंबर 2023 में उन्हें सीने में भारीपन, सांस लेने में तकलीफ, पेट में दर्द, मिचली, सिरदर्द और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत हुई। इसके बाद उन्हें मैक्स हेल्थकेयर अस्पताल, वैशाली में भर्ती कराया गया।
बीमा कंपनी ने उनका कैशलेस इलाज का अनुरोध ठुकरा दिया, इसलिए उन्हें खुद 1,54,144 रुपये का भुगतान करना पड़ा। बाद में उन्होंने यह पैसा वापस पाने के लिए बीमा कंपनी के सामने क्लेम किया।
बीमा कंपनी ने क्लेम क्यों ठुकराया?
ओरिएंटल इंश्योरेंस ने शिवानी का क्लेम इस कारण रद्द कर दिया कि उनके सभी जांच रिपोर्ट सामान्य थे और अस्पताल में भर्ती होना केवल निगरानी और डायग्नोस्टिक करने के लिए था। कंपनी ने पॉलिसी की एक शर्त का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि अगर भर्ती होने का मुख्य मकसद सिर्फ जांच करना है, तो उसका खर्चा नहीं दिया जाएगा।
मरीज ने आयोग को क्या बताया?
शिवानी ने आयोग को बताया कि उनके भर्ती रहने के दौरान बायोप्सी, एंडोस्कोपी, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी कई गंभीर जांचें हुईं। साथ ही, उन्हें नसों के जरिए फ्लूइड और एंटीबायोटिक्स भी दिए गए। अस्पताल की डिस्चार्ज रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें गंभीर गैस्ट्राइटिस, थायराइड की बीमारी और अंडाशय में गांठ (ओवेरियन सिस्ट) जैसी बीमारियां पाई गईं। इसका मतलब यह सिर्फ जांच नहीं थी, बल्कि पूरा इलाज चल रहा था।
उपभोक्ता आयोग ने क्या कहा?
आयोग ने देखा कि ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी ना तो आयोग में पेश हुई और ना ही अपनी तरफ से कोई लिखित जवाब दिया। सबसे बड़ी बात, उसने डॉक्टरों की रिपोर्ट को गलत साबित करने के लिए कोई दूसरी मेडिकल राय या सबूत भी पेश नहीं किया।
आयोग ने साफ कहा कि जब मरीज का इलाज चल रहा था, तो यह सिर्फ जांच के लिए भर्ती नहीं थी। इसलिए बीमा कंपनी वाली “सिर्फ जांच” वाली शर्त इस मामले में लागू नहीं होती। आयोग ने यह भी कहा कि बीमा कंपनी खुद डॉक्टर नहीं बन सकती और डॉक्टरों के फैसले को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकती।
आयोग ने बीमा कंपनी को क्या आदेश दिया?
आयोग ने दावा रद्द करने को “सेवा में कमी” माना और ओरिएंटल इंश्योरेंस को 1,54,144 रुपये (पूरा इलाज खर्च) देने का आदेश दिया। इस राशि पर 29 दिसंबर 2023 से लेकर असल भुगतान होने तक सालाना 6% ब्याज भी देने का हुक्म दिया। इसके अतिरिक्त, उन्हें मानसिक परेशानी और दिक्कतों के लिए 50,000 रुपये मुआवजा भी देना होगा और कोर्ट-कचहरी के खर्चे के लिए 20,000 रुपये अलग से भी देने होंगे।
अगर देर हुई तो क्या होगा?
आयोग ने चेतावनी दी कि अगर बीमा कंपनी 30 दिनों के अंदर यह पूरी रकम नहीं चुकाती है, तो उसे बाकी पूरी राशि (मुआवजे सहित) पर सालाना 9% ब्याज देना होगा। यानी देरी करना बीमा कंपनी के लिए और भी महंगा पड़ सकता है।
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