हैदराबादी खिचड़ी उत्तर भारत में बनने वाली सादी खिचड़ी से बिल्कुल अलग होती है. इसमें बासमती चावल और मसूर की दाल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे असली घी और खड़े मसालों के साथ पकाया जाता है. इस खिचड़ी की खुशबू और स्वाद इसे खास बनाते हैं. हालांकि, इस डिश की असली जान इसके साथ परोसा जाने वाला ‘खट्टा’ होता है. खट्टा इमली के पल्प, भुनी हुई मूंगफली, तिल और सूखे नारियल के पेस्ट से तैयार किया जाता है. इसमें कड़ी पत्ता और राई का तड़का लगाया जाता है, जो इसके स्वाद को और भी बेहतरीन बना देता है.
प्यास को नियंत्रित करने में करता है मदद
स्थानीय लोगों का मानना है कि सहरी में खिचड़ी-खट्टा और कीमा खाने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है. इमली से बना खट्टा पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है और दिनभर प्यास को नियंत्रित रखने में मदद करता है. वहीं घी और कीमा शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे रोजेदार पूरे दिन बिना थकान के रोजा रख सकते हैं. यही वजह है कि यह डिश वर्षों से सहरी के लिए सबसे पसंदीदा भोजन बनी हुई है.
गंगा-जमुनी तहजीब और नवाबी विरासत का हिस्सा है यह डिश
रमजान के दौरान हैदराबाद के पुराने शहर के इलाके जैसे चारमीनार, नामपल्ली और टोली चौकी रातभर रोशनी और रौनक से जगमगाते रहते हैं. यहां के मशहूर होटल नयाब और शादाब जैसे स्थानों पर सहरी के समय हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है. लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ देर रात तक बाहर आकर इस पारंपरिक नाश्ते का आनंद लेते हैं.
दरअसल, हैदराबाद की यह डिश सिर्फ एक व्यंजन नहीं है, बल्कि यहां की गंगा-जमुनी तहजीब और नवाबी विरासत का हिस्सा है. हर साल रमजान के महीने में खिचड़ी, खट्टा और कीमा का यह स्वाद लोगों को एक साथ बैठकर खाने और खुशियां बांटने का मौका देता है. यही वजह है कि यह परंपरा आज भी उतनी ही लोकप्रिय है और हैदराबाद के दस्तरख्वान की शान बनी हुई है.
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