झारखंड के हजारीबाग में भी रमजान के दौरान बकरखानी की खूब मांग रहती है. खासकर शहर के जामा मस्जिद रोड की एक गली बकरखानी के लिए प्रसिद्ध है. यहां करीब आधा दर्जन बेकरी ऐसी हैं, जहां पूरे रमजान के महीने लगातार बकरखानी और अन्य मिठाइयां बनाई जाती हैं.
बकरखानी की शुरुआत भले ही बांग्लादेश से मानी जाती है, लेकिन आज यह सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहा. भारत के कई शहरों में इसके दीवाने मिल जाते हैं. धीरे-धीरे यह पकवान समाज और संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. झारखंड के हजारीबाग में भी रमजान के दौरान बकरखानी की खूब मांग रहती है. खासकर शहर के जामा मस्जिद रोड की एक गली बकरखानी के लिए प्रसिद्ध है. यहां करीब आधा दर्जन बेकरी ऐसी हैं, जहां पूरे रमजान के महीने लगातार बकरखानी और अन्य मिठाइयां बनाई जाती हैं.
गर्म भट्टी में तैयार होता है बकरखानी
इसी गली में स्थित गोल्डन बेकरी के संचालक मोहम्मद सोनू बताते हैं कि इस पूरे गली में लगभग 100 वर्षों से बकरखानी, श्रीमल, पाव और टोस्ट जैसे बेकरी उत्पाद बनाए जा रहे हैं. पहले यहां केवल एक दो दुकानें हुआ करती थीं लेकिन समय के साथ इनकी संख्या बढ़ती चली गई. आज यह गली बेकरी के लिए जानी जाती है. रमजान के महीने में बकरखानी और श्रीमाल की बिक्री सबसे अधिक होती है. सहरी के समय लोग विशेष रूप से इन दोनों चीजों की मांग करते हैं. मोहम्मद सोनू ने आगे बताया बताया कि उनकी दुकान में प्रतिदिन लगभग एक क्विंटल मैदे से बकरखानी और एक क्विंटल मैदे से श्रीमाल तैयार किया जाता है. यहां बनी हुई श्रीमाल और बकरखानी केवल हजारीबाग तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि गिरिडीह रामगढ़ और कोडरमा जैसे आसपास के जिलों में भी इसकी सप्लाई की जाती है. खास बात यह है कि उनका दुकान में आज पारंपरिक लकड़ी के भट्टी में बकरखानी तैयार किया जाता है.
बकरखानी मिलता है 10 रुपये में एक पीस
बकरखानी की कीमत भी इतनी है हर कोई इसका खरीददारी आसानी से खरीदारी सकते है. कीमत की बात करें तो बकरखानी की शुरुआत 10 रुपये प्रति पीस से होती है, जबकि इसके बड़े और खास किस्म के पीस 120 रुपये तक में उपलब्ध होते हैं. इसकी कीमत उसके आकार और उसमें डाले गए मैटिरियल पर निर्भर करती है.बकरखानी बनाने की प्रक्रिया भी काफी रोचक होती है. बेकरी के कारीगर मोहम्मद बबलू ने रेसिपी साझा करते हुए कहा कि इसे बनाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं होता है. इसे बनाना के लिए सबसे पहले मैदा, ईस्ट रिफाइंड तेल और पानी की मदद से आटा गूंथा जाता है. इसके बाद इसे लगभग आधे घंटे तक रखा जाता है, ताकि ईस्ट अच्छी तरह फूल सके. इस मैदे को छोटे-छोटे आकार में बेलकर उसके अंदर मावा, नारियल और कई तरह के ड्राई फ्रूट्स भरे जाते हैं. इसके बाद उसे आकर्षक तरीके से सजाकर लगभग 180 डिग्री तापमान वाली भट्टी में करीब पांच मिनट तक पकाया जाता है.
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