भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए विशेष कदम उम्मीद से कहीं ज्यादा सफल साबित हुए हैं। बुधवार को केंद्रीय बैंक की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, इन योजनाओं के जरिए देश में कुल 136.38 अरब डॉलर का विदेशी धन आया है। इतनी बड़ी रकम आने से भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति मजबूत हुई है और बाहरी आर्थिक झटकों के समय रुपये को संभालने की क्षमता भी बढ़ी है।
गौरतलब है कि इन उपायों की घोषणा जून में उस समय की गई थी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं के कारण भारत के आयात खर्च पर दबाव बढ़ रहा था। ऐसी स्थिति में देश के भुगतान संतुलन पर असर पड़ने की आशंका थी। रिजर्व बैंक का मकसद विदेशों में रहने वाले भारतीयों और दूसरे स्रोतों से स्थिर डॉलर प्रवाह बढ़ाना था।
मौजूद जानकारी के अनुसार, सबसे ज्यादा धन विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए शुरू की गई विदेशी मुद्रा जमा योजना के जरिए आया। इस योजना से अर्थशास्त्रियों को 80 से 90 अरब डॉलर आने का अनुमान था, लेकिन वास्तविक रकम इससे काफी ज्यादा रही। भारतीय बैंकों ने अनिवासी विदेशी मुद्रा जमा के जरिए 127.23 अरब डॉलर जुटाए। इसके अलावा बाहरी वाणिज्यिक ऋण के माध्यम से 3.89 अरब डॉलर और विदेशों से विदेशी मुद्रा में लिए गए अन्य ऋणों के जरिए 5.26 अरब डॉलर जुटाए गए हैं।
बता दें कि आर्थिक दबाव के समय भारत पहले भी विदेशों में रहने वाले अपने नागरिकों से डॉलर जुटाता रहा है। वर्ष 2013 में शुरू की गई ऐसी ही एक योजना से करीब 26 अरब डॉलर जुटाए गए थे। इस बार बड़े स्तर पर धन आने के कारण रिजर्व बैंक को रुपये में अचानक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए अतिरिक्त ताकत मिली है।
एशिया मामलों के रणनीतिकार विवेक राजपाल के अनुसार, इस बार आया धन अनुमान से काफी ज्यादा है। इससे रुपये की स्थिति और बाजार में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की रिजर्व बैंक की क्षमता को लेकर भरोसा बढ़ता है। उनका मानना है कि इसी मजबूत प्रतिक्रिया के कारण केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा जमा की योजना को निर्धारित समय से पहले बंद करने का फैसला किया।
यह योजना पहले सितंबर के अंत तक चलने वाली थी, लेकिन भारी मात्रा में धन आने के बाद इसे 31 अगस्त को ही बंद कर दिया गया। हालांकि, बैंकों को विदेशों से धन जुटाने की एक अलग सुविधा अब भी उपलब्ध है।
इन डॉलर का सीधा फायदा देश के विदेशी मुद्रा भंडार को भी मिला है। बैंकों द्वारा जुटाई गई विदेशी मुद्रा को रिजर्व बैंक के साथ विनिमय किया जाता है, जिससे भंडार में बढ़ोतरी होती है। 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर रिकॉर्ड 729.33 अरब डॉलर पहुंच गया था।
यह स्थिति ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब महंगा कच्चा तेल और अमेरिकी सरकारी बांड पर बढ़ती ब्याज दरें रुपये पर दबाव डाल सकती हैं। बाजार में ऐसी चर्चा भी है कि रिजर्व बैंक हाल के दिनों में रुपये को सहारा देने के लिए डॉलर की बिक्री बढ़ा रहा है।
हालांकि, इस बड़ी रकम का एक दूसरा पहलू भी है। जिन विदेशी मुद्राओं को अभी जुटाया गया है, उन्हें भविष्य में वापस करना होगा। यानी मौजूदा समय में भंडार मजबूत हुआ है, लेकिन आगे चलकर रिजर्व बैंक पर भुगतान की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। जुलाई में केंद्रीय बैंक की विदेशी मुद्रा वायदा देनदारी बढ़कर रिकॉर्ड 136.7 अरब डॉलर पहुंच गई थी। इनमें बड़ी रकम तीन से पांच वर्ष की अवधि के लिए जुटाई गई है।
मैक्वायरी के अनुसार, अभी इन पैसों से वित्तीय मदद जरूर मिली है, लेकिन यदि इस तरह का धन लगातार और बिना सीमा के जुटाया जाता तो भविष्य में एक साथ बड़ी रकम लौटाने का दबाव बन सकता था और उस समय रुपये में अस्थिरता बढ़ने का खतरा रहता।
दूसरी चिंता बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ती नकदी को लेकर है। विदेशी डॉलर को रुपये में बदलने पर बैंकिंग व्यवस्था में बड़ी मात्रा में रुपये की अतिरिक्त नकदी पहुंचती है। अर्थशास्त्री सिद्धार्थ कोठारी के मुताबिक, पहले से ही बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी मौजूद है। ऐसे में रिजर्व बैंक को इस अतिरिक्त राशि का कुछ हिस्सा वापस खींचना पड़ सकता है, ताकि महंगाई पर दबाव न बढ़े।
इसके लिए नकद आरक्षित अनुपात में अस्थायी या स्थायी बदलाव जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजना के तहत जुटाई गई रकम को सामान्य नकद आरक्षित नियमों से छूट दी गई थी। ऐसे में आने वाले समय में रिजर्व बैंक के सामने चुनौती यह होगी कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग व्यवस्था में संतुलित नकदी के बीच सही तालमेल बनाए रखा जाए।
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