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केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में पेपर लीक से जुड़ा संशोधन बिल पेश किया। खड़गे विपक्ष की तरफ से चर्चा में शामिल हुए।
राज्यसभा में पेपर लीक से जुड़े परीक्षा संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे के ‘मनुस्मृति’ बयान पर हंगामा हुआ। वे शैक्षणिक संस्थाओं पर RSS के दखल पर बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों में मनुस्मृति मानने वाले बढ़ गए हैं, इससे शूद्र को पढ़ने का अधिकार छिन गया है। इस पर सदन में हंगामा शुरू हो गया।
जेपी नड्डा ने टोकते हुए कहा कि खड़गे का बयान तथ्यों से परे है। इससे अशांति फैल सकती है। इसके बाद सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि मनुस्मृति वाला बयान रिकॉर्ड से हटा दिया जाएगा।
यह पूरी बहस पेपर लीक से जुड़े पब्लिक एग्जामिनेशन (अनफेयर मीन्स की रोकथाम) संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान हुई।
इससे पहले, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में पेपर लीक से जुड़ा बिल पेश किया। लोकसभा में बुधवार को करीब 7 घंटे बहस के बाद पेपर लीक से जुड़ा बिल पारित हुआ था।
मनुस्मृति पर हंगामा क्यों हुआ, दावे और फैक्ट से समझें

फैक्ट चैक: खड़गे ने जो सजाएं बताईं, वे मूल मनुस्मृति में नहीं, बल्कि ‘गौतम धर्मसूत्र’ (अध्याय 12, श्लोक 4-6) में लिखी हैं। हालांकि, खड़गे ने बाद में कहा कि गौतम ऋषि ने लिखा है।
सुधांशु त्रिवेदी ने जवाब में कहा- मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि विलियम जोन्स कलकत्ता हाईकोर्ट के जज थे। उन्होंने 1790 मनु स्मृति का अनुवाद किया। आधुनिक युग के शेड्यूल कास्ट का मनु काल के वैदिक शूद्र के साथ कोई कनेक्शन नहीं है। विलियम जोन्स से पहले की 2 और मनुस्मृति कहीं अवेलेबल नहीं हैं।
मासिर-ए-आलमगीरी, शाहनामा, जहांगीरनामा, तुज़ुक-ए-बाबरी, फुतूहात-ए-फिरोजशाही और तहकीके हिंद भी उपलब्ध हैं। इसलिए मैंने कहा कि मुझे प्रमाण चाहिए, क्योंकि जो खड़गे ने कहा- उसे अंग्रेजों ने बनाया है। विलियम जोन्स से पहले का कोई टेक्स्ट अवेलेबल नहीं हैं।
फैक्ट चेक: विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला अंग्रेजी अनुवाद 1794 में ‘Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Menu’ नाम से पब्लिश किया था। यह किताब आज भी सार्वजनिक डोमेन में है। इसे गूगल बुक्स, इंटरनेट आर्काइव और ब्रिटिश लाइब्रेरी की वेबसाइटों पर मुफ्त में पढ़ा जा सकता है।
सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर कि किताब ‘हू वर द शुद्राज’ के चैप्टर के पहले पेज के पैराग्राफ 3 में लिखा है कि आधुनिक अनुसूचित जातियों और प्राचीन वैदिक काल के शूद्रों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।
फैक्ट चेक: अंबेडकर ने लिखा है कि आधुनिक शूद्र और प्राचीन वैदिक काल के शूद्र एक ही वर्ग नहीं थे। प्राचीन शूद्र मूल रूप से क्षत्रिय थे, जिन्हें ब्राह्मणों से विवाद के बाद ‘उपनयन संस्कार’ से वंचित कर दिया गया, जिससे वे चौथे वर्ण में गिर गए। वे आज की अनुसूचित जातियों से अलग थे।
प्रमोद तिवारी ने एक किताब दिखाते हुए कहा कि यह इनके कार्यकाल में छपी है, चल रही है, प्रतिबंधित नहीं है। अगर ये कह रहे हैं, दिखा रहे हैं, तो गलती इनकी है।12 साल से इनकी सरकार है।
जेपी नड्डा ने कहा कि ब्रिटिश टाइम से पहले का ओरिजिनल टेक्स्ट लाइए। सबूत दीजिए।
खड़गे बोले- शाह जवाब नहीं दे सकते तो इस्तीफा दें; 5 बड़ी बातें

1. सरकार दबाव में झुकी: सरकार को छात्रों के आंदोलन और जनदबाव के आगे झुकना पड़ा। धर्मेंद्र प्रधान को हटाना और संशोधन बिल लाना छात्रों के हित में नहीं, बल्कि सरकार की कुर्सी बचाने की मजबूरी थी।
2. सिर्फ सजा बढ़ाने से नहीं रुकेगा पेपर लीक: जुर्माना 1 करोड़ से 10 करोड़ करना, सजा कड़ी करना, स्पेशल टास्क फोर्स और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना पर्याप्त नहीं है। असली जरूरत परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने की है।
3. 152 परीक्षाओं के पेपर लीक: कुछ सालों में 152 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए, लेकिन किसी दोषी को सजा नहीं मिली। NTA के कई पद खाली हैं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के बजाय RSS से जुड़े लोगों की नियुक्तियां की जा रही हैं।
4. अमित शाह जवाब दें: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया। अगर गृह मंत्री अमित शाह इस पर जवाब नहीं दे सकते तो इस्तीफा दें।
5. शूद्र वाले बयान पर हंगामा: नए सिलेबस में ऐसे संदर्भ जोड़े जा रहे हैं, जिनमें शूद्रों के वेदपाठ सुनने या बोलने पर कठोर दंड का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि ऐसी सोच रखने वालों को शिक्षा व्यवस्था से बाहर किया जाना चाहिए। इस बयान पर सत्ता पक्ष ने जोरदार हंगामा किया।

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