शनिवार को कुछ समय के लिए रुका सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन दोबारा शुरू किया गया। बारिश और घने कोहरे के कारण अभियान में मुश्किलें आ रही थीं, लेकिन मौसम में थोड़ी राहत मिलते ही हेलीकॉप्टर फिर से आसमान में नजर आए। जमीन पर बचाव दल मलबे और तबाह हो चुकी संरचनाओं के बीच संभावित जीवित लोगों की तलाश करते रहे। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास स्थित रसुवा और नुवाकोट शामिल हैं। इन पहाड़ी क्षेत्रों में हालात खास तौर पर चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि कई जगहों पर रास्ते टूट गए हैं और भारी मलबे ने पहुंच को मुश्किल बना दिया है।
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बुधवार को ग्लेशियर के टूटने के बाद पहाड़ी नदी तंत्र में अचानक पानी का सैलाब उमड़ पड़ा। यह सामान्य बाढ़ नहीं थी। पानी के साथ चट्टानें, बर्फ, मिट्टी और भारी मलबा इतनी तेजी से नीचे आया कि रास्ते में आने वाली इमारतें, पुल और बिजलीघर तक इसकी चपेट में आ गए। कुछ ही समय में कई इलाकों का पूरा भूगोल बदल गया। जहां पहले सड़कें और पुल लोगों को जोड़ते थे, वहां अब मलबे का ढेर दिखाई दे रहा है। बचावकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कई जगहों पर पहुंचने के रास्ते खुद बाढ़ में बह चुके हैं।
इस आपदा का असर नेपाल तक सीमित नहीं रहा। तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में भी भारी तबाही हुई, जहां नेपाल-चीन सीमा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण क्रॉसिंग कॉम्प्लेक्स पानी और मलबे के तेज बहाव में पूरी तरह तबाह हो गया। चीन के मुताबिक, तिब्बत में इस आपदा के कारण 16 लोगों की मौत हुई है और 546 लोग अभी लापता हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में बाढ़ का विशाल सैलाब इमिग्रेशन बिल्डिंग के पूरे परिसर को अपनी चपेट में लेता दिखाई दिया। इन तस्वीरों ने दुनिया भर का ध्यान इस आपदा की भयावहता की ओर खींचा।
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नेपाल की मुश्किल घड़ी में भारत ने राहत अभियान तेज कर दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के मुताबिक, भारत ने नेपाल के लिए चौथी राहत उड़ान भेजी, जिसमें करीब 11 टन राहत सामग्री थी। भारतीय वायुसेना के C-130 विमान से भेजी गई इस खेप में सर्च एंड रेस्क्यू उपकरण, टनल तकनीकी टीम, फोरेंसिक विशेषज्ञों से जुड़ी सामग्री और DNA विश्लेषण के लिए जरूरी उपकरण शामिल हैं। इसके साथ ही कंबल, स्लीपिंग बैग, तिरपाल, प्लास्टिक शीट और हाइजीन किट जैसी जरूरी चीजें भी भेजी गई हैं। इन सामानों का इस्तेमाल राहत शिविरों और प्रभावित इलाकों में तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है।
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जयशंकर के अनुसार, 230 फुट लंबे सिंगल-लेन मॉड्यूलर स्टील ब्रिज के लिए जरूरी उपकरणों से लदे 16 ट्रक नेपाल पहुंच चुके हैं। इसके अलावा सात और बेली ब्रिज के लिए जरूरी सामान भी जल्द भेजे जाने की तैयारी है। इन पुलों को स्थापित करने के लिए तकनीकी टीमें भी नेपाल पहुंचेंगी। उम्मीद है कि अस्थायी पुल तैयार होने के बाद उन इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाना आसान होगा जहां फिलहाल संपर्क टूट चुका है।
भारत की ओर से नेपाल के लिए अब तक 68.5 टन राहत सामग्री एयरलिफ्ट की जा चुकी है। इसमें जरूरी दवाइयां, पोर्टेबल जनरेटर, खाने के पैकेट, पानी साफ करने वाली गोलियां और तकनीकी उपकरण शामिल हैं। नेपाल को इस समय सिर्फ भोजन और दवाइयों की जरूरत नहीं है। कई इलाकों में सड़क और पुलों के टूट जाने के कारण भारी मशीनरी, तकनीकी विशेषज्ञों और खोज-बचाव उपकरणों की भी जरूरत पड़ रही है।
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