दिल्ली में मेडिकल कॉलेज दाखिले के लिए दो काउंसलिंग प्राधिकरणों के होने के चलते टॉप रैंक वाले उम्मीदवार दिल्ली की दो अलग-अलग (समानांतर) काउंसलिंग प्रक्रियाओं में एक साथ सीटें ब्लॉक करके बैठे रहते हैं।
दिल्ली में कौन किन सीटों की काउंसलिंग कराता है
MCC दिल्ली के कुछ कॉलेजों (जैसे MAMC, LHMC, UCMS, VMMC) में 15% ऑल इंडिया कोटा और 85% दिल्ली कोटा की काउंसलिंग कराता है। वहीं, GGSIPU दिल्ली के अन्य कॉलेजों (BSAMCH और NDMC) में 85% दिल्ली कोटा के तहत अलग से काउंसलिंग कराता है।
क्यों होती है मुश्किल
चूंकि ये दोनों काउंसलिंग अथॉरिटी के सिस्टम अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, इसलिए टॉप रैंक वाले उम्मीदवार अपनी अंतिम पसंद तय करने से पहले दोनों जगहों पर अस्थायी रूप से सीट रोक कर रख सकते हैं।
टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने माना कि यह व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या है, न कि किसी काउंसलिंग एजेंसी की विफलता। चूंकि अधिकांश राज्यों में एक ही काउंसलिंग प्रणाली है, इसलिए वहां एक छात्र एक साथ दो अलग-अलग सिस्टम में सीट नहीं रोक सकता। लेकिन दिल्ली में दो स्वतंत्र प्रणालियां होने के कारण यह संभव हो जाता है। इसका सबसे अधिक नुकसान उन छात्रों को होता है जिनकी NEET रैंक शुरुआती कटऑफ से थोड़ी नीचे होती है। उन्हें यह स्पष्ट नहीं होता कि बाद में सीट खाली होगी या नहीं। ऐसे में कई छात्र सीट गंवाने के डर से दूसरे राज्यों के कॉलेजों में प्रवेश ले लेते हैं। एक बार ऐसा करने पर वे दिल्ली की स्ट्रे वैकेंसी राउंड के लिए अयोग्य हो जाते हैं, भले ही बाद में दिल्ली में सीट खाली हो जाए।
एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “या तो इंतजार करें और उम्मीद करें कि सीट खाली होगी, या फिर दूसरे राज्य में दाखिला ले लें, क्योंकि एक साल गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते।”
क्या नियमों का उल्लंघन हो रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि उम्मीदवार दोनों काउंसलिंग प्रक्रियाओं में भाग लेकर कोई नियम नहीं तोड़ रहे हैं। समस्या यह है कि दोनों सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े नहीं हैं, इसलिए अंतिम विकल्प चुनने तक दोनों जगह की सीटें रोकी जा सकती हैं। रिपोर्ट में एक उदाहरण भी दिया गया है, जिसमें 183 रैंक वाले उम्मीदवार को MCC के जरिए VMMC और GGSIPU के जरिए BSAMCH दोनों में सीट आवंटित हुई।
दिल्ली में
- मेडिकल दाखिले दो अलग-अलग काउंसलिंग एजेंसियां काम करती हैं।
- MCC: ऑल इंडिया कोटा ( AIQ) सीटों के साथ MAMC, LHMC, UCMS, VMMC, ABVIMS-RML जैसे मेडिकल कॉलेजों की काउंसलिंग कराता है।
- GGSIPU: BSAMCH और NDMC मेडिकल कॉलेज की 85% दिल्ली कोटा सीटों पर दाखिला कराता है।
- दोनों के अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म हैं।
यदि उम्मीदवार दोनों जगह सीट पा ले, तो एक सीट चुनने तक दूसरी सीट खुद ब खुद रद्द नहीं होती। इस कारण कई सीटें अंतिम निर्णय तक अन्य छात्रों के लिए उपलब्ध नहीं हो पातीं। ओवरलैपिंग अलॉटमेंट के लिए कोई ऑटोमेटिक कैंसलेशन नहीं होता है।
ज्यादातर राज्यों में
- सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए एक ही काउंसलिंग प्राधिकरण होता है।
- केवल एक काउंसलिंग प्लेटफॉर्म होता है।
- एक राउंड से दूसरे राउंड में सीटें जल्दी खाली होकर आगे बढ़ जाती हैं।
क्या है हल
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, साझा (कॉमन) काउंसलिंग प्लेटफॉर्म या ऐसा एकीकृत सॉफ्टवेयर विकसित करना दीर्घकालिक समाधान हो सकता है, जो छात्र द्वारा अंतिम विकल्प चुनते ही दूसरी सीट अपने आप रद्द कर दे।
राज्य नहीं छोड़ना चाहते काउंसलिंग सिस्टम से अपना नियंत्रण
यह भी ऑप्शन सुझाया गया है कि दिल्ली के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को एक ही स्वास्थ्य विश्वविद्यालय के अधीन लाया जाए, जैसा कि कई अन्य राज्यों में होता है। हालांकि, स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के कारण इस तरह के सुधार लागू करना आसान नहीं है। आमतौर पर राज्य दाखिले के काउंसलिंग सिस्टम से अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए अनिच्छुक रहते हैं।
विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि यदि किसी छात्र को अगले राउंड में नई सीट मिल जाती है, तो MCC उसकी पहले से आवंटित सीट अपने आप रद्द कर दे, जिससे सीटें जल्दी खाली हों और अन्य छात्रों को समय पर अवसर मिल सके।
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