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NCLT ने जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में ₹22 हजार करोड़ के कुल कर्ज को महज ₹6.5 करोड़ में निपटाने के प्लान को मंजूरी दी है। इससे कर्ज देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने 99.97% बकाए पैसे का नुकसान सहना पड़ेगा।
सुभाष चंद्रा के कर्ज निपटारे से जुड़ी हर जानकारी, 10 सवाल-जवाब में…
सवाल 1. NCLT ने सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में क्या फैसला सुनाया है?
जवाब: इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल NCLT ने सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत मंजूरी दे दी है। इसके तहत सुभाष चंद्रा को ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा। इसके बाद उनका बाकी का पूरा ₹22,000 करोड़ से अधिक का बकाया कानूनी तौर पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
सवाल 2. यह फैसला किसने सुनाया और ट्रिब्यूनल में राय क्या थी?
जवाब: इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में इस मामले को लेकर विभाजित राय आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के रूप में जुडिशियल मेम्बर नीलेश शर्मा को नियुक्त किया। नीलेश शर्मा ने बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।
सवाल 3. किस प्रमुख बैंक या संस्थान ने इस फैसले का विरोध किया था?
जवाब: LIC हाउसिंग फाइनेंस की अगुआई में कुछ कर्जदाताओं ने इस रीपेमेंट प्लान पर आपत्ति जताई थी। LIC हाउसिंग ने इसे “अव्यवहारिक और गैर-कानूनी” बताते हुए कहा था कि उन्हें ₹1,322.39 करोड़ के बकाए के बदले केवल ₹38.09 लाख दिए जा रहे हैं।
सवाल 4. NCLT ने असहमति जताने वाले लेनदारों की आपत्तियों को क्यों खारिज किया?
जवाब: NCLT ने पाया कि विरोध करने वाले लेनदारों के पास 20% से भी कम वोटिंग शेयर थे। रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की जरूरी मंजूरी मिल चुकी थी। कानून के मुताबिक, बहुमत की मंजूरी के कारण ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज कर दिया।
सवाल 5. NCLT ने चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को सही ठहराने के लिए क्या तर्क दिया?
जवाब: ट्रिब्यूनल ने कहा कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के मूल्यांकन के अनुसार सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य प्लान में दी गई राशि से कम है। अगर यह प्लान खारिज होता, तो चंद्रा दिवालिया घोषित हो जाते और लेनदारों को इससे भी कम राशि मिलती। प्लान मंजूर होने से चंद्रा आर्थिक रूप से दोबारा खड़े हो सकेंगे और मूल देनदारों से भविष्य में वसूली की संभावना बनी रहेगी।
सवाल 6. अब इस केस की आगे की प्रक्रिया क्या होगी?
जवाब: कोर्ट की मंजूरी के बाद, अब रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल सभी लेनदारों की एक अंतिम सूची बनाएगा। इसके बाद ₹6.5 करोड़ की रकम को इन सभी बैंकों और लेनदारों में नियम के अनुसार बांटा जाएगा। आखिर में, यह मामला दोबारा इंसॉल्वेंसी अदालत की मुख्य बेंच के पास जाएगा। वहां से औपचारिक कानूनी मोहर लगते ही यह केस पूरी तरह से बंद हो जाएगा।
सवाल 7. इस फैसले का भारतीय बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: यह फैसला आने वाले ऐसे सभी मामलों के लिए एक बड़ी मिसाल बनेगा। इससे साफ संदेश मिलता है कि अगर 75% से ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक या लोग किसी रीपेमेंट प्लान पर राजी हो जाते हैं, तो अदालत उनके इस कारोबारी फैसले को ही सर्वोच्च मानेगी। फिर भले ही बैंकों को उनका 99% से ज्यादा पैसा छोड़ना पड़े और रिकवरी के नाम पर सिर्फ नाममात्र की रकम ही क्यों न मिले।
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