भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को निर्णायक रूप से अपने पक्ष में ढालने की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहा है। हम आपको बता दें कि क्षेत्रीय राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच भारत ने संवाद, रणनीति और शक्ति संतुलन के माध्यम से अपनी स्थिति को मजबूती से स्थापित किया है। चीन से लेकर दक्षिण एशिया के अन्य देशों तक, हर मोर्चे पर भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह न केवल क्षेत्रीय स्थिरता का केंद्र है, बल्कि भविष्य की वैश्विक दिशा तय करने में भी उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
भारत-चीन संबंध
सबसे पहले भारत और चीन संबंधों की बात करें तो दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद संवाद की प्रक्रिया जारी है। ब्रिक्स तंत्र के अंतर्गत सहयोग को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चीन ने भारत की अध्यक्षता का समर्थन किया है और भारत ने भी इस मंच पर चीन की भूमिका की सराहना की है। हाल ही में चीन के विशेष दूत झाई जुन ने नई दिल्ली में बैठक के दौरान यह कहा कि दोनों देश प्रमुख विकासशील राष्ट्र होने के नाते अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर निरंतर संवाद बनाए हुए हैं। भारत की ओर से भी यह संकेत दिया गया कि क्षेत्रीय तनाव को कम करने और शांति स्थापित करने के लिए ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर कार्य किया जाएगा। यह भी महत्वपूर्ण है कि ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीन के शीर्ष नेतृत्व का भारत दौरा प्रस्तावित है, जो गलवान घटना के बाद संबंधों में एक नई दिशा का संकेत देता है। एससीओ सम्मेलन में शिरकत करने गये रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अपने चीनी समकक्ष के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर हुई चर्चा भी दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इसे भी पढ़ें: भारत नरक नहीं, स्वर्ग का अहसास है, मानवता का वैभव, सभ्यता का प्रकाश है!
भारत-नेपाल संबंध
वहीं भारत और नेपाल संबंधों पर नजर डालें तो हाल के घटनाक्रम सहयोग के नए अवसरों की ओर इशारा करते हैं। नेपाल में नई सरकार के गठन के बाद वहां भारत का पहला उच्च स्तरीय संपर्क होने जा रहा है। हम आपको बता दें कि भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी काठमांडू जाने की तैयारी में हैं। दोनों देशों के बीच बहुआयामी सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इस यात्रा को दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है, जिससे व्यापार, ऊर्जा और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई गति मिल सकती है। साथ ही, यह भी संकेत मिला है कि भारत नेपाल के नए नेतृत्व के साथ प्राथमिकताओं को समझकर आगे बढ़ना चाहता है। नेपाल द्वारा अमेरिका और चीन के साथ भी संपर्क बढ़ाने के बीच भारत का यह संतुलित दृष्टिकोण कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत-बांग्लादेश संबंध
अब भारत और बांग्लादेश संबंधों की बात करें तो हाल के समय में इसमें उतार चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन अब दोनों देश संबंधों को पुनः मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत ने बांग्लादेश में अपने उच्चायुक्त के रूप में एक अनुभवी राजनेता दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति की है, जो इस संबंध की संवेदनशीलता को दर्शाता है। बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में आई खटास को दूर करने के प्रयास तेज हुए हैं। हाल ही में उच्च स्तरीय बैठकों में व्यापार, ऊर्जा और जनसंपर्क जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। भारत ने बांग्लादेश में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेकर यह संकेत दिया कि वह संबंधों को स्थिर और सकारात्मक दिशा में ले जाना चाहता है। दोनों देशों के बीच लगातार संवाद जारी है, जो दीर्घकालिक साझेदारी की मजबूती को दर्शाता है।
भारत-श्रीलंका संबंध
वहीं भारत और श्रीलंका संबंधों की चर्चा करें तो यहां सहयोग का स्वरूप अधिक व्यावहारिक और सामरिक दिखाई देता है। भारत ने श्रीलंका की तटरक्षक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए उपकरण सौंपे हैं, जिससे समुद्री सुरक्षा और खोज बचाव कार्यों में सुधार होगा। इसके साथ ही दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यास आयोजित किया गया, जिससे आपसी तालमेल और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिला। इस अभ्यास में विशेष समुद्री संचालन और प्रशिक्षण शामिल थे, जो सुरक्षा सहयोग की गहराई को दर्शाते हैं। इसके अलावा भारत ने मानवीय सहायता के तहत चिकित्सा इकाइयां भी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, जो आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं में मददगार होंगी।
अब इन सभी संबंधों का सामरिक विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ संतुलित, सहयोगात्मक और बहुआयामी संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चाहे वह चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देश के साथ संवाद बनाए रखना हो, नेपाल के साथ पारंपरिक संबंधों को नया आयाम देना हो, बांग्लादेश के साथ राजनीतिक बदलाव के बावजूद साझेदारी को मजबूत करना हो या श्रीलंका के साथ रक्षा और मानवीय सहयोग बढ़ाना हो, भारत की नीति में निरंतरता और स्पष्टता दिखाई देती है।
देखा जाये तो मोदी सरकार की विदेश नीति का एक प्रमुख पहलू यह रहा है कि उसने पड़ोसी देशों को प्राथमिकता दी है। पड़ोसी पहले की नीति के तहत भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि क्षेत्रीय स्थिरता और विकास में उसकी भूमिका निर्णायक बनी रहे। इस नीति के तहत संवाद, सहायता, निवेश और सुरक्षा सहयोग को समान महत्व दिया गया है। भारत ने जहां एक ओर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है, वहीं दूसरी ओर व्यावहारिक सहयोग के माध्यम से विश्वास भी मजबूत किया है।
देखा जाये तो इन प्रयासों का प्रभाव केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिलेगा। एक स्थिर और सहयोगपूर्ण दक्षिण एशिया वैश्विक शांति, व्यापार और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। भारत यदि अपने पड़ोस में स्थिरता स्थापित करता है, तो यह उसे एक जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा। बहरहाल, वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि भारत और उसके पड़ोसी देशों के संबंध धीरे धीरे बेहतर दिशा में बढ़ रहे हैं। संवाद, सहयोग और संतुलन की यह नीति आने वाले समय में क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.