देश की सरकारों के पास हर समस्या का एक लाइलाज रामबाण इलाज यह है कि किसी समस्या की गहराई के उपचार के बजाए कानून बना दिया जाए। सरकारें हर समस्या का इलाज व्यवहारिक धरातल पर नहीं बल्कि कानून में ढूंढने की आदी हो चुकी हैं। देश में हर क्षेत्र में एक के बाद एक नए कानून बनाए जा रहे हैं, किन्तु समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जितने भी नए कानून बनाए जा रहे हैं, या पुराने कानूनों मे संशोधन किया जा रहा, उसका सारा भार देश के आम लोगों पर ही डाला जा रहा है। इन काूननों में कहीं लापरवाही बरतने या अनदेखी के लिए देश के आला अफसर जिम्मेदार नहीं हैं। आजादी से लेकर आज तक ऐसा कोई कानून केंद्र या किसी राज्य ने नहीं बनाया है कि यदि कोई घटना—दुर्घटना या कांड होगा तो उसके लिए सीधे अफसर भी जिम्मेदार माने जाएंगे।
संशोधित केंद्रीय पेपर लीक कानून में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने पर कम से कम 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा होगी। अधिकतम जुर्माना 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। संगठित अपराधों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। पेपर लीक का नया केंद्रीय कानून बनाने के बावजूद झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताएं हुईं। इस मामले में अब तक 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जेपीएससी के चेयरमैन एल. खियांगटे ने इस्तीफा भी दे दिया। केंद्र सरकार के बनाए पेपर लीक परीक्षा कानून देश में एक अगस्त से अस्तित्व मे आ चुका है। इसके बावजूद देश में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले थम नहीं रहे हैं।
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राजस्थान में अप्रैल 2022 में एंटी पेपर लीक एक्ट लागू किया गया। गुजरात में मार्च 2023 से सख्त नकल और पेपर लीक विरोधी कानून लागू। उत्तराखंड में वर्ष 2023 में प्रतियोगी परीक्षा अध्यादेश/कानून लागू किया गया। झारखंड में वर्ष 2023 में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए अधिनियम बनाया गया। हरियाणा में सितंबर 2021 से प्रभावी कानून लागू है। इसी तरह असम, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी अलग-अलग वर्षों में इससे जुड़े कड़े कानूनी प्रावधान या अधिनियम बनाए जा चुके हैं। केंद्र और इतने राज्यों में पेपर लीक कानून के बाद भी पेपर लीक की घटनाएं थम नहीं रही है।
पेपर लीक की तरह देश में बलात्कार के मामलों में बेहद कठोर कानून बनाए गए थे। बलात्कार और इसके साथ हत्या के मामलों में फांसी तक का प्रावधान किया गया है। 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी चार भारतीय पुरुषों को फांसी दे दी गई थी। निर्भया बलात्कार हत्याकांड से लोगों में आक्रोश फैल गया था और भारत में बलात्कार विरोधी नए कानून बनाए गए। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। गैंग रेप में न्यूनतम सजा 20 साल से आजीवन की गई।
इतने कठोर कानून के लागू होने के बावजूद देश में बलात्कार—हत्या के मामले बढ़ते चले गए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साल 2023 में 31,982 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। इससे जाहिर है कि नए कठोर कानूनों का अपराधियों को कोई भय नहीं है। ये कानून महज कागज का पुलिन्दा साबित हो रहे हैं। यही भ्रष्टाचार का भी हाल है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कठोर कानून बने हुए हैं, इसके बावजूद देश से भ्रष्टाचार खत्म होना तो दूर बल्कि कम तक नहीं हो सका। आए दिन कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। भ्रष्टाचार खत्म नहीं करने के लिए कभी किसी अफसर को जिम्मेदार नहीं माना गया। बेशक उनके विभाग का ही कोई भ्रष्टाचारी क्यों न पकड़ा जाए।
आज तक जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसमें अफसरों की जिम्मेदारी कहीं भी तय नहीं की गई। मसलन सड़क पर गडढा होने से यदि कोई सड़क दुर्घटना होती है या फिर बगैर अग्नि सुरक्षा उपायों के संचालित किसी व्यवसायिक भवन में अग्नि दुर्घटना होती है तो इसके निगरानी करने वाले अफसर जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, ऐसा कोई कानून नहीं बना है। यही प्रमुख वजह है कि चाहे पेपर लीक हों या किसी तरह का बड़ा हादसा, कानूनों को सख्त कर दिया जाता है, किन्तु जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती।
इसका बड़ा उदाहरण मेलों, धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में भगदड़ के दौरान होने वाली मौतें हैं। ऐसा शायद ही कोई साल जाता होगा, जब ऐसे हादसे नहीं होते होंगे। ऐसे हादसों में अब तक देश भर में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद अफसरों की ज्मिमेदारी तय नहीं की गई। ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया कि ऐसे आयोजनों में हादसों के लिए सीधे अफसर जिम्मेदार ठहराएं जाएंगे, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलेगा और उन्हे जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी।
अफसरों की लापरवाही से हुए हादसों और इससे बच निकलने का बड़ा उदाहरण राजस्थान का है। जहां दो साल पहले स्कूल की छत्त गिरने से 10 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई, इसके बाद भी स्कूल की छत्त गिरने या दीवार गिरने के हादसे होते रहे, किन्तु एक भी अफसर को आपराधिक आरोपी नहीं माना गया। किसी पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पुलिस ने आईएएस अफसर तो दूर बल्कि शिक्षा विभाग के किसी अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की। राजस्थान सहित देश के लाखों सरकारी स्कूलों की इमारतों की हालत खस्ता है। सरकारों के पास इतना बजट ही नहीं है कि इतना रखरखाव किया जा सके।
यह निश्चित है कि चुनी हुई सरकारें लंबे अर्से तक देश के लोगों की आंखों में धूल नहीं झौंक सकती, उन्हें कानून बनाने के साथ ही धरातल पर समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा। देश में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच आम नागरिकों तक बढ़ानी होगी। इसकी कमी से हर साल बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल के अभाव जैसे मुद्दों पर धरने, प्रदर्शन, आंदोलन होते हैं, किन्तु इनका स्थायी समाधान नहीं होता। सरकारों की हालत ‘खेत खाए गदहा और मार खाए जुलहा’ जैसी है। जब तक सरकारें और जिम्मेदार अफसर अपनी जिम्मेदारी से भागते रहेंगे। ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बेशक कितने भी नए कानून बन जाएं।
– योगेन्द्र योगी
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