प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चांसलर स्टॉकर का स्वागत करते हुए इसे विशेष अवसर बताया और इस बात पर जोर दिया कि यूरोप के बाहर अपनी पहली यात्रा के लिए भारत को चुनना ऑस्ट्रिया की भारत के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते के बाद आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के नए अवसर सामने आए हैं।
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भारत और ऑस्ट्रिया के संबंध पहले से ही अवसंरचना, नवाचार और सतत विकास के क्षेत्रों में मजबूत रहे हैं। दिल्ली मेट्रो और अटल सुरंग जैसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में ऑस्ट्रिया की तकनीकी विशेषज्ञता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके अलावा रेलवे परियोजनाओं, रोपवे, स्वच्छ ऊर्जा और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में भी ऑस्ट्रियाई कंपनियों की सक्रिय भागीदारी रही है।
दोनों देशों के बीच हुए 15 करार
इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कुल पंद्रह महत्वपूर्ण समझौते और पहलें सामने आईं, जो रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, नवाचार और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों को कवर करती हैं। इनमें सबसे प्रमुख है आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कार्य समूह की स्थापना का प्रस्ताव, जो वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से निपटने में रणनीतिक सहयोग को मजबूत करेगा।
रक्षा क्षेत्र में भी सहयोग को नई गति देने के लिए सैन्य मामलों में सहयोग पर एक आशय पत्र पर सहमति बनी है। इसके तहत रक्षा उद्योग, नीति संवाद, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। यह पहल भारत और यूरोप के बीच हाल ही में हुए सुरक्षा सहयोग को भी मजबूती प्रदान करेगी।
आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक फास्ट ट्रैक तंत्र स्थापित करने की घोषणा की गई है, जिससे दोनों देशों की कंपनियों और निवेशकों को आने वाली समस्याओं का शीघ्र समाधान किया जा सकेगा। इससे व्यापार को सुगम बनाने और निवेश को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए ऑडियो विजुअल सह उत्पादन समझौता किया गया है, जिससे दोनों देशों के फिल्म उद्योग के बीच संयुक्त निर्माण और सांस्कृतिक आदान प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है, जिसके तहत वैज्ञानिक सहयोग, मानकों के आदान प्रदान और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जाएगा। इससे कृषि और खाद्य उत्पादों के व्यापार को भी मजबूती मिलेगी।
इसके अलावा, दोनों देशों के बीच कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक संयुक्त आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसमें प्रशिक्षुता प्रणाली, ज्ञान साझा करने और योग्यता की पारस्परिक मान्यता पर जोर दिया गया है। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए संरचित संवाद शुरू करने और तकनीकी विश्वविद्यालयों के माध्यम से भारतीय छात्रों के लिए नए अवसर उपलब्ध कराने की पहल भी की गई है।
इस यात्रा के दौरान स्टार्टअप सहयोग को बढ़ाने, साइबर सुरक्षा संवाद शुरू करने, अंतरिक्ष उद्योग में संयुक्त सेमिनार आयोजित करने और वर्किंग हॉलिडे कार्यक्रम को लागू करने जैसी घोषणाएं भी की गईं। उच्च प्रौद्योगिकी जैसे क्वांटम तकनीक, मशीन लर्निंग, जल शोधन और सामग्री विज्ञान में संयुक्त अनुसंधान को साझेदारी का मुख्य आधार बनाया गया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भारत की प्रतिभा और ऑस्ट्रिया की नवाचार क्षमता मिलकर वैश्विक स्तर पर भरोसेमंद तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला विकसित कर सकती है। उन्होंने रक्षा, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी और क्वांटम क्षेत्रों में सहयोग की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया। इसके अलावा, मानव संसाधन के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाया है। वर्ष 2023 में हुए प्रवासन और गतिशीलता समझौते के तहत अब नर्सिंग क्षेत्र में भी सहयोग को विस्तार दिया जाएगा। युवा आदान प्रदान को प्रोत्साहित करने के लिए वर्किंग हॉलिडे कार्यक्रम की शुरुआत की गई है।
साथ ही वैश्विक परिदृश्य पर चर्चा करते हुए दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि सैन्य संघर्ष किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। चाहे यूक्रेन का संकट हो या पश्चिम एशिया की स्थिति, दोनों देशों ने स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया। साथ ही वैश्विक संस्थाओं में सुधार और आतंकवाद के पूर्ण उन्मूलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
हम आपको एक बार फिर बता दें कि ऑस्ट्रिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण यूरोपीय साझेदार है। यह मध्य और पूर्वी यूरोप में प्रवेश का एक प्रमुख द्वार है और हरित प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा तथा उन्नत इंजीनियरिंग में इसकी विशेषज्ञता भारत के विकास कार्यक्रमों के लिए उपयोगी है। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है और यह लगभग तीन अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है।
वैश्विक परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा?
देखा जाये तो भारत और ऑस्ट्रिया के बीच मजबूत होते संबंधों का प्रभाव वैश्विक भू-राजनीति पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। यूरोप के मध्य में स्थित ऑस्ट्रिया, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सेतु का काम करता है, जिससे भारत को यूरोप के बाजारों, तकनीक और निवेश तक बेहतर पहुंच मिलती है। इस सहयोग से भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भूमिका और अधिक मजबूत होगी, विशेषकर उच्च प्रौद्योगिकी, रक्षा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में। इसके साथ ही, ऑस्ट्रिया का भारत के प्रति समर्थन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को सुदृढ़ करेगा, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता जैसे मुद्दों पर। दक्षिण एशिया के संदर्भ में यह साझेदारी भारत की रणनीतिक बढ़त को और मजबूत करेगी, क्योंकि उन्नत तकनीक, रक्षा सहयोग और आर्थिक निवेश के माध्यम से भारत क्षेत्रीय नेतृत्व को और प्रभावी ढंग से स्थापित कर सकेगा। इससे न केवल भारत की सुरक्षा क्षमताएं बढ़ेंगी, बल्कि वह क्षेत्र में स्थिरता, विकास और संतुलन बनाए रखने में भी अधिक सक्षम भूमिका निभा सकेगा।
बहरहाल, ऑस्ट्रिया के चांसलर की भारत यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के संबंध अब पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर नवाचार केंद्रित और भविष्य उन्मुख साझेदारी की ओर अग्रसर हैं। दोनों देशों ने मिलकर एक ऐसे सहयोग मॉडल की नींव रखी है जो न केवल द्विपक्षीय हितों को साधेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी स्थिरता और प्रगति में योगदान देगा।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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