बीते तीस मार्च को गृहमंत्री अमित शाह ने लाल आतंक के रूप में कुख्यात रहे माओवादी और नक्सली आतंकवाद के खात्मे का औपचारिक अंत की घोषणा कर दी है। चाहे माओवाद हो या नक्सलवाद, दोनों ही धाराएं उग्रपंथी वामपंथ से प्रभावित रही हैं। इनका मानना रहा है कि सत्ता बंदूक की नली या बारूद से निकलती है। इसी विचारधारा के तहत इस वैचारिकी ने भारत के तकरीबन एक तिहाई जिलों पर अरसे तक कब्जा जमाए रखा। इस विचारधारा से प्रभावित लाल आतंक एक दौर में पशुपति से लेकर तिरूपति तक फैला हुआ था। लेकिन अब यह निस्तेज हो चुका है। ज्यादातर नक्सली या माओवादी लड़ाके या तो हथियार डाल कर मुख्यधारा की जिंदगी में वापस लौट गए हैं या फिर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए हैं। लेकिन अब भी इस विचारधारा से प्रभावित एक वर्ग बचा हुआ है। जिसका सत्ता के प्रतिष्ठानों पर भले ही प्रभाव ना हो, लेकिन तंत्र पर उसका प्रभाव अब भी है।
मार्च 2022 में जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के घाटी छोड़ने की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म आई थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ नामक इस फिल्म में एक संवाद है, सत्ता भले ही उनकी है, लेकिन सिस्टम अपना है। इस संवाद में जिस सिस्टम की ओर इशारा है, दरअसल तंत्र पर उसका ही प्रभाव है। कहना न होगा कि यह प्रभावी तबका वैसी ही उग्र वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है, जिसके बारूदी रूख के अंत का ऐलान गृहमंत्री अमित शाह ने किया है। कभी दिल्ली विश्वविद्यालय में सक्रिय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिज्ञासु कार्यकर्ताओं ने इसे ‘अर्बन नक्सल’ कहा था। अर्बन यानी शहरी नक्सल। याद कीजिए, छह अप्रैल 2010 की घटना, जब बस्तर में सीआरपीएफ के 74 जवानों को घेरकर नक्सलियों ने बारूदी सुरंगों के जरिए उड़ाकर मार डाला था। इस लोमहर्षक कार्रवाई भारतीय राष्ट्र राज्य पर अर्बन नक्सल समुदाय ने बड़ी जीत के रूप में देखा था। राजधानी दिल्ली में लाल गढ़ के रूप में विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह ने इस कार्रवाई पर खुलेआम खुशियां जताई थीं। तमाम विश्वविद्यालयों के वामपंथी प्रोफेसरों और छात्रों के एक समूह ने इस लोमहर्षक हत्या कांड को भारतीय राज व्यवस्था पर नक्सली जीत के रूप में लिया था। बस्तर की इस घटना के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार सकते में थी। उसने समानांतर सत्ता चला रहे नक्सली और माओवादी आतंकियों पर हवाई कार्रवाई करने का विचार शुरू कर दिया था। लेकिन शहरी इलाकों के वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध शुरू किया। तंत्र में इनकी उपस्थिति कितनी प्रभावी है, इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनमोहन सरकार ने नक्सली हिंसा का प्रभावी जवाब देने का विचार त्याग दिया था।
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नक्सलवाद कहें या माओवाद या फिर वामपंथ की कोई अन्य धारा, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, पत्रकारिता, स्वयंसेवी संगठनों, वकालत, अस्पतालों, प्रशासनिक व्यवस्था और कर्मचारीतंत्र में भी इनके प्रभावी लोग अब भी मिल जाएंगे। अरूंधती रॉय, हर्ष मंदर, प्रशांत भूषण जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवी तो खुद ही मानते हैं कि वे इस विचारधारा से हैं।
तंत्र में इस विचारधारा के प्रभावी होने की शुरूआत 1969 में कांग्रेस के विभाजन से होती है। तब अपनी केंद्रीय सत्ता को बचाने के लिए इंदिरा गांधी को वामपंथी दलों के सहयोग की जरूरत थी। उन्होंने सहयोग किया भी, बदले में शैक्षिक संस्थानों पर उनका प्रभाव बढ़ा। इसकी वजह यह रही कि इंदिरा सरकार ने शोध और शैक्षिक संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों को इन्हीं के हवाले कर दिया। इस विचारधारा ने अपने ही लोगों को इन संस्थानों में खूब भरा।
2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो यह वैचारिकी पहले सकते में रही। बाद में इसने रणनीति और पैंतरा बदला। शुरू में तो इस विचारधारा ने कभी पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में वैचारिकी आधारित आंदोलन छेड़ा तो कभी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में लड़कियों से छेड़खानी के बहाने राष्ट्रवादी विचाराधारा को निशाने पर लेकर आंदोलन चलाया। हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित बेमुला के बहाने राष्ट्रवादी शासन व्यवस्था के दौरान कथित तौर पर दलितों और पिछड़ों के उत्पीड़न का आरोप लगाकर वैचारिक आंदोलन खड़ा किया। दो कृषि कानूनों के बदलाव के विरोध में लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को भी इस वैचारिकी का खुला समर्थन रहा। टूल किट गिरोह इसी दौरान बेपर्दा हुए। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देशभर के अल्पसंख्यकों को भड़काने और उन्हें आंदोलन में लाने के पीछे भी यही विचारधारा रही। इन आंदोलनों के लंबे समय तक चलने, इनके लिए लोगों के एकत्रित होने की वजह से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहरी नक्सलियों का कितना बड़ा नेटवर्क है और कितनी गहराई तक उनकी पहुंच है।
मोदी सरकार के बाद राष्ट्रवादी विचारधारा को उम्मीद थी कि सत्ता केंद्रों और संस्थानों से इस विचारधारा की विदाई हो जाएगी। लेकिन अब भी यह विचारधारा प्रभावी तौर पर उपस्थित है। इस विचारधारा के कतिपय क्रांतिकारियों ने तो अब चोला तक बदल लिया है और मौजूदा सत्ता तंत्र में भागीदार भी बन चुके हैं। पत्रकारिता में अब भी इस विचारधारा के लोगों की भारी संख्या है। इसकी वजह से अब भी नैरेटिव का मायाजाल रचने में यह विचारधारा प्रभावी हो जाती है। नागरिक समाज में इस विचारधारा के लोग तभी पहचान में आते हैं, जब वे बहसों में हिस्सा लेते हैं या आंदोलनों में खुली भागीदारी करते हैं। अन्यथा समाज के सभी वर्गों की तरह इनको भी आसानी से सामान्य जन पहचान नहीं पाता। शहरी नक्सलवादियों की एक खासियत यह है कि वे खासा पढ़ते लिखते हैं। इसलिए बहसों में उनकी भागीदारी प्रभावी रहती है। लेकिन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का माखौल उड़ाना उन्हें सबसे प्रिय है। वैसे भारतीय शैक्षिक संस्थानों में एक सोच गहरे तक पैठी हुई है कि युवावस्था में जो वामपंथी नहीं हुआ, इसका अभिप्राय है कि उसमें कोई न कोई कमी है। इस सोच की बुनियाद और संस्थानों में अपनी प्रभावी उपस्थिति के चलते यह विचारधारा अक्सर युवाओं को प्रभावित कर लेती है। उसके आगोश में आने के बाद युवा भारतीयता, भारतीय मूल्य और सांस्कृतिक परंपराओं का माखौल उड़ाने लगता है, उसे पूजा-पाठ दकियानूसी लगने लगता है। हालांकि अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक कलाप उसे प्रगतिशीलता की निशानी लगने लगते हैं। इस तरह समाज के बीच वे अपनी वैचारिक धारा को बनाए रखने के जतन में जुटे रहते हैं।
जंगलों, खेतों-खलिहानों और आदिवासी इलाकों में खून की होली खेलने, रेल की पटरियां उड़ाने, स्कूलों को उड़ाने वाली खूनी नक्सली और माओवादी विचारधारा के समर्थक और नेतृत्वकर्ता भले ही सुरक्षा बलों की कार्रवाई और समानांतर चलाई गई विकास योजनाओं के चलते खत्म हो गए हों या हथियार डाल दिए हों, लेकिन किताबों, बहसों और नैरेटिव के सहारे लड़ाई चलाने वाले माओवादी और नक्सली अब भी बाकी हैं और तंत्र में प्रभावी मौजूदगी भी रखते हैं। कहा जाता है कि विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं। उनके अनुयायियों की संख्या कम-ज्यादा जरूर हो सकती हैं। मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक तंत्र ऐसा नहीं रहा कि हथियार के सहारे क्रांतियां कर ली जाएं और सत्ताएं बदल दी जाएं। ऐसा होता तो अमेरिका पूरी दुनिया पर राज कर रहा होता, क्योंकि उसकी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है, उसके पास हथियारों का अकूत भंडार है। अब राजसत्ताओं को बारूद या बंदूक के जरिए नहीं बदला जा सकता। बारूद और बंदूक के सहारे सत्ता बदलने वाला तंत्र इसीलिए पस्त हो गया। लेकिन वैचारिक लड़ाई करने वालों को समानांतर खड़ा मजबूत वैचारिक तंत्र ही मात दे सकता है। दूसरी बात यह है कि वैचारिक तंत्र को जहां से खाद-पानी मिलता है, उस स्रोत को ही खत्म करके वैचारिकी को काबू में किया जा सकता है। वैचारिकी की बुनियाद पर जहर फैलाने वाले लोगों को सामाजिक तौर पर अलग-थलग करना भी इसे रोकने की रणनीति हो सकती है। जब तक ऐसे कदम नहीं उठाए जाएंगे, जंगलों और आदिवासी इलाकों की बंदूकें भले ही शांत हो जाएं, सामाजिक तौर पर वाम वैचारिकी मजबूत उपस्थिति बनाए रखेगी और अगर वह प्रभावी रही तो देर-सवेर किसी और रूप में फिर से लाल आतंक को सिर उठाने के लिए प्रेरित करेगी। इस नजरिए से भी इस समस्या और शहरी माओवाद या नक्सलवाद को भी देखना एवं परखना होगा।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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