लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन का अंत कर ममता बनर्जी वर्ष 2011 में पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थी। वर्ष 2016 में ममता बनर्जी ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता। वर्ष 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने का पुरजोर दावा किया। बीजेपी ने उस चुनाव को कांटे की टक्कर का बना देने में कामयाबी भी हासिल की और नतीजे भी उसके हिसाब से शानदार ही रहे लेकिन ममता बनर्जी उससे कहीं ज्यादा आगे रही। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सीटों की संख्या अप्रत्याशित रूप से 3 से बढ़कर सीधे 77 पर तो पहुंच गई लेकिन 48.5 प्रतिशत वोट के बल पर 215 सीटें जीतकर ममता बनर्जी लगातार तीसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बन गईं। इस बार जहां ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए चुनाव लड़ रही है, वहीं बीजेपी के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है। बीजेपी को इस बात का बखूबी अहसास है कि अगर इस बार पार्टी बंगाल में सत्ता में आने से चूक गई तो पार्टी के लिए राज्य में संगठन और कैडर तक बचाना मुश्किल हो जाएगा।
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चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण के तहत राज्य की जिन 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। उन सीटों पर अब तक तीन करोड़ सात लाख 77 हजार 171 मतदाता मतदान के लिए पात्र हैं। इनमें एक करोड़ 84 लाख 99 हजार 496 पुरूष मतदाता है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या एक करोड़ 75 लाख 77 हजार 210 है। दोनों चरणों को अगर मिलाकर देखा जाए तो महिला मतदाताओं की संख्या 3.33 करोड़ है जो कि पुरुष मतदाताओं के लगभग ही है। इसलिए बंगाल में किसकी सरकार बनेगी, यह महिला वोटरों के रूख पर ही ज्यादा निर्भर करेगा।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक तरफ जहां बीजेपी महिला आरक्षण से जुड़े बिल के लोकसभा में पास नहीं होने का ठीकरा ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर फोड़ रही है, वहीं टीएमसी अपने महिला सांसदों की संख्या और महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिक्र करते हुए बीजेपी को ही महिला विरोधी साबित करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सौगातों की बौछार कर दी है। जिसके जवाब में ममता ने पहले से ही चलाई जा रही लक्ष्मी भंडार योजना की राशि बढ़ाने का वायदा किया है।
महिला वोटरों के साथ ही राज्य में मुस्लिम मतदाता भी ममता बनर्जी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 125 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में है और इसमें से ज्यादातर सीटों पर टीएमसी का ही कब्जा है। ममता की पार्टी का आरोप है कि एसआईआर के नाम पर मुस्लिम वोटरों के ही नाम काटे गए हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी भी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
महिला और मुस्लिम वोटरों के साथ ही ब्रांड मोदी और ममता भी राज्य के जनादेश को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश के जरिए ममता बनर्जी को महिला विरोधी बताते हुए मोर्चा खोल दिया है, उससे साफ-साफ नजर आ रहा है कि इस देश के कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव की तर्ज पर ही बंगाल में भी बीजेपी ‘ब्रांड मोदी’ के नाम पर ही चुनाव लड़ रही है। जबकि टीएमसी पिछले 3 विधानसभा चुनावों की तरह ही इस बार भी ‘ब्रांड ममता बनर्जी’ पर ही निर्भर है।
पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य, घमासान और चुनावी बयानबाजी से यह साफ-साफ नज़र आ रहा है कि इस राज्य का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का चुनाव बन गया है। कांग्रेस पार्टी और लेफ्ट फ्रंट, दूर-दूर तक मुकाबले में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। हालांकि , इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि चुनावी राजनीति में जनता कभी-कभी अप्रत्याशित चमत्कार भी कर देती है।
संतोष कुमार पाठक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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