नगरीय विकास एवं आवास विभाग राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को जाति प्रमाणपत्र विवाद में बड़ी राहत मिली है। राज्यस्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति ने जांच के बाद उनके अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र को वैध माना है। समिति ने कहा कि राज्यमंत्री बागरी के परिवार के राजपूत होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। समिति के मुताबिक, शिकायतकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके। इसके उलट 1950 से लेकर अब तक के राजस्व अभिलेख, वंशावली, शैक्षणिक रिकॉर्ड, जाति प्रमाणपत्र, निर्वाचन रिकॉर्ड और अन्य सरकारी दस्तावेज उनके परिवार के अनुसूचित जाति से संबंधित होने की पुष्टि करते हैं। समिति ने कहा- आजादी के बाद के शुरुआती राजस्व रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण सबूत हैं। इनमें राज्यमंत्री के परिवार की जाति बागरी दर्ज है। ऐसे रिकॉर्ड में बाद में बदलाव की संभावना कम मानी जाती है इसलिए इन्हें विशेष महत्व दिया गया। कांग्रेस नेता ने लगाई थी याचिका दरअसल, कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 24 अप्रैल को याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने फैसला राज्यस्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति पर छोड़ा था। कोर्ट ने समिति को 60 दिन में निर्णय लेने को कहा था। समिति के अध्यक्ष गुलशन बामरा, सचिव सत्येंद्र सिंह जबकि सदस्य- विषय विशेषज्ञ मातादीन कनेरिया और सुधीर श्रीवास्तव थे। परिवार के दूसरे दस्तावेजों से भी बागरी होने की पुष्टि समिति ने राजस्व अभिलेख, खसरा-खतौनी, परिवार की वंशावली, स्कूल रिकॉर्ड, निर्वाचन संबंधी दस्तावेज, पूर्व में जारी जाति प्रमाणपत्र, परिवार के सदस्यों के अभिलेख और संबंधित विभागों से प्राप्त रिकॉर्ड जांचे। सभी में परिवार की जाति बागरी ही दर्ज मिली। किसी भी दस्तावेज में परिवार को राजपूत नहीं बताया गया। राजस्व अधिकारी, जाति प्रमाणपत्र जारी करने वाले सक्षम प्राधिकारी और अन्य विभागों से रिपोर्ट भी ली गई। सभी पक्षों को सुनने और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद फैसला किया गया। शिकायतकर्ता न्यायिक मंच पर चुनौती देने स्वतंत्र समिति ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा- उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रतिमा बागरी का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र वैध है। इसे निरस्त करने का कोई तथ्यात्मक या कानूनी आधार नहीं मिला इसलिए शिकायत को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि शिकायतकर्ता इस निष्कर्ष से असहमत हैं तो वे सक्षम न्यायिक मंच पर इसे चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं।
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